
जमशेदपुर: तरुण भारत संघ, आईआईटी (आईएसएम) धनबाद, युगांतर भारती, नेचर फाउंडेशन, स्वर्णरेखा क्षेत्र विकास ट्रस्ट, जल बिरादरी और मिशनY के संयुक्त तत्वावधान में शुक्रवार को साकची स्थित मोती लाल नेहरू पब्लिक स्कूल में दो दिवसीय राष्ट्रीय नदी पर्वत सम्मेलन की शुरुआत हुई। इस राष्ट्रीय सम्मेलन का मुख्य उद्देश्य देश के नदी और पहाड़ों के संरक्षण के लिए एक विशिष्ट और ठोस कानून बनाना है। कार्यक्रम की शुरुआत दीप प्रज्जवलन से हुई, जिसमें देश भर से आए डेलीगेट्स और पर्यावरण विशेषज्ञों ने हिस्सा लिया।

जलपुरुष राजेंद्र सिंह ने व्यवस्था पर उठाए सवाल
मैग्सेसे पुरस्कार विजेता जलपुरुष राजेंद्र सिंह ने सम्मेलन को संबोधित करते हुए कहा कि सरकारों ने बीते 77 सालों में सिर्फ एनवायरमेंट प्रोटेक्शन एक्ट जैसे ‘जुगाड़’ वाले कानून बनाए हैं, जो पर्यावरण को स्थाई सुरक्षा नहीं देते। उन्होंने कहा:
“भारतीय संविधान के आर्टिकल 21 और 41 में जीवन बचाने की जिम्मेदारी सिर्फ इंसानों की नहीं, बल्कि पेड़-पौधों और जीव-जंतुओं की भी है। आज विकास के नाम पर प्रकृति का दोहन नहीं, बल्कि बेरहमी से शोषण हो रहा है।”
राजेंद्र सिंह ने अरावली पर्वतमाला की कानूनी लड़ाई का जिक्र करते हुए सुप्रीम कोर्ट के कुछ फैसलों पर भी सवाल उठाए। उन्होंने अथर्ववेद का उदाहरण देते हुए युवाओं से प्रकृति की रक्षा के लिए आगे आने का आह्वान किया।
संसद का विशेष सत्र बुलाने की मांग: वी. गोपाला गौड़ा
सर्वोच्च न्यायालय के सेवानिवृत्त न्यायाधीश वी. गोपाला गौड़ा ने पहाड़ों और नदियों के लिए सख्त कानून न बन पाने पर चिंता व्यक्त की। उन्होंने राष्ट्रपति और प्रधानमंत्री से अपील करते हुए कहा कि जिस तरह 2004 और 2023 में संसद का विशेष सत्र बुलाया गया था, उसी प्रकार नदी और पर्वतों को लुप्त होने से बचाने के लिए संसद का विशेष सत्र आहूत किया जाए। उन्होंने जोर दिया कि पर्यावरण सुरक्षा और बच्चों के सुरक्षित भविष्य के लिए सुप्रीम कोर्ट को भी इन मामलों में अधिक सक्रिय होना होगा।
स्वर्णरेखा नदी और झारखंड के पहाड़ों की स्थिति दयनीय: सरयू राय
जमशेदपुर पश्चिम के विधायक सरयू राय ने कहा कि नदियों और पहाड़ों के संरक्षण के लिए एक सशक्त ड्राफ्ट तैयार किया गया है, जिसमें जरूरी सुधार किए जा रहे हैं। उन्होंने चिंता जताते हुए कहा कि वर्ष 2005 तक जमशेदपुर के लोग जिस स्वर्णरेखा नदी के पानी पर आश्रित थे, 2026 में उसकी स्थिति अत्यंत खराब और प्रदूषित हो चुकी है। इसके अलावा साहेबगंज के पहाड़ों को बेतरतीब तरीके से काटा जा रहा है, जिसे बिना सख्त कानून के रोकना असंभव है।
नदियों को संसाधन नहीं, मां का दर्जा दें: दिनेश मिश्र
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प्रख्यात पर्यावरणविद दिनेश मिश्र ने कहा कि नदियों से अत्यधिक छेड़छाड़ के कारण ही आज आपदाएं आ रही हैं। उन्होंने कहा कि जब हम नदी को मां मानते हैं, तो उसे सिर्फ एक उपभोग का ‘सं संसाधन’ नहीं समझना चाहिए। वहीं जल बिरादरी के राष्ट्रीय संयोजक बोलिशेट्टी सत्यनारायणा ने चेतावनी दी कि यदि पहाड़ नहीं बचे तो बारिश नहीं होगी। आईआईटी धनबाद के प्रोफेसर अंशुमाली ने तकनीकी डेटा साझा करते हुए बताया कि दामोदर नद की लंबाई में 70 फीसदी तक की कमी आई है, जो पर्यावरण के लिए एक बड़ा खतरा है।
तकनीकी सत्र में प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड की विफलता पर चर्चा
सम्मेलन के प्रथम तकनीकी सत्र में विशेषज्ञों ने पर्यावरण कानूनों की मॉनीटरिंग करने वाली संस्थाओं को आड़े हाथों लिया। डॉ. राकेश कुमार सिंह ने कहा कि राज्य प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड पूरी तरह फेल साबित हुए हैं। जमशेदपुर में टनों मछलियों की मौत इसका ताजा उदाहरण है। पत्रकार विवेक कुमार तिवारी ने बताया कि सारंडा के जंगलों में अत्यधिक माइनिंग के कारण अब साल के पेड़ भी सूख रहे हैं।
इस अवसर पर प्रसेनजीत सरकार, शिवम ठाकुर और आकाश जायसवाल द्वारा खरकई नदी पर लिखी गई पुस्तक का विमोचन भी किया गया। सम्मेलन का समापन शनिवार (23 मई) को होगा।



