
जमशेदपुर: कहते हैं इंसान इस दुनिया में खाली हाथ आता है और खाली हाथ चला जाता है, लेकिन कुछ विरले व्यक्तित्व ऐसे होते हैं जो अपने पीछे कर्मों की ऐसी खुशबू छोड़ जाते हैं जिसकी महक सदियों तक समाज को प्रेरित करती है। औद्योगिक नगरी जमशेदपुर के मानगो डिमना चौक (पंचवटी कॉलोनी) निवासी रहे महेंद्र नारायण सिंह एक ऐसे ही कर्मयोगी थे। आज शनिवार (27 जून) को उनके श्राद्ध कर्म के पुण्य अवसर पर पूरा शहर उनके परोपकारी और सादगीपूर्ण जीवन को नमन कर रहा है।

90 वर्ष की आयु में भी शारीरिक रूप से पूरी तरह फिट रहकर समाज सेवा करने वाले महेंद्र नारायण सिंह ने कोरोना काल जैसी वैश्विक महामारी के दौरान भी मानव सेवा की एक अनुकरणीय मिसाल पेश की थी।
बचपन में दादा से मिली सीख, ‘बिन कहे मदद’ बना नियम
बिहार के भोजपुर जिले के कोइलवर क्षेत्र के श्रीपालपुर गांव में 29 सितंबर 1936 को जन्मे महेंद्र नारायण सिंह को समाज सेवा के संस्कार बचपन में अपने दादा से मिले थे। पिता हरि नंदन सिंह से मिली शिक्षा उनके जीवन का आधार बनी। उनका यह कड़ा नियम था कि अड़ोसी हो या पड़ोसी, परिचित हो या अपरिचित—जैसे ही उन्हें जरा भी भान होता कि किसी को मदद की दरकार है, वे बिना किसी के मांगे सहायता के लिए खड़े हो जाते थे।
बबुरा स्कूल से टाटा स्टील के ‘टिस्को’ तक का सफर
उनकी प्रारंभिक शिक्षा गांव के बबुरा स्कूल से हुई। इसके बाद आरा के प्रसिद्ध एच.डी. जैन कॉलेज से इंटरमीडिएट और सासाराम के शारदा प्रसाद जैन कॉलेज से स्नातक (ग्रेजुएशन) की डिग्री हासिल की। उच्च शिक्षा पूरी करने के बाद उन्होंने जमशेदपुर का रुख किया और 21 जनवरी 1960 को तत्कालीन ‘टिस्को’ (अब टाटा स्टील) में अपनी पेशेवर शुरुआत की।
जुगसलाई का वह दौर और अटूट मित्रमंडली
नौकरी के शुरुआती दौर में वर्ष 1961 में वे जुगसलाई में रहे। वहां उनकी मुलाकात महावीर सिंह से हुई, जिनके साथ समसामयिक मुद्दों पर वैचारिक चर्चा उनकी दिनचर्या का हिस्सा बन गई। इसी कालखंड में टिस्को के एफिल टावर में कार्यरत काशीडीह निवासी ठाकुर प्यारा सिंह से भी उनका गहरा संबंध बना। प्यारा सिंह की रुचि को देखते हुए उनका झुकाव भी कबड्डी जैसे खेलों की ओर हुआ।
1962 से मानगो बना कर्मभूमि, संस्थाओं को दी दिशा
वर्ष 1962 से 1964 के बीच उन्होंने मानगो की कुंवर बस्ती में अपना मकान लिया और यहीं स्थायी रूप से बस गए। इसके बाद मानगो ही उनकी मुख्य कर्मभूमि रहा:
क्षत्रिय सभा: वे क्षत्रिय सभा की मानगो इकाई में बेहद सक्रिय रहे और तीन बार महासचिव का दायित्व संभाला।
मानगो विकास समिति: क्षेत्र के नागरिक सुधारों के लिए समिति के संयुक्त सचिव के रूप में निरंतर संघर्ष किया।
हाथी घोड़ा मंदिर कमेटी: स्वर्णरेखा नदी तट पर स्थित प्रसिद्ध हाथी घोड़ा मंदिर के सचिव के रूप में ऐतिहासिक योगदान दिया।
रिटायरमेंट के बाद लेखन और समाज को समर्पण
टाटा स्टील में 39 वर्षों की लंबी और बेदाग सेवा के बाद वे 1 जून 1999 को सेवानिवृत्त हुए। इसके बाद का जीवन उन्होंने पूरी तरह रचनात्मक लेखन और समाज के नाम कर दिया। इस सफर में जीवनसंगिनी लोंगा देवी का उन्हें संबल मिला। वे अक्सर कहा करते थे—“जीवन के इस मुकाम पर यदि मैं समाज को कुछ दे सका, तो यह बहुत बड़ी बात होगी, क्योंकि मुझे इसी समाज ने खड़ा किया है।”
आज भले ही महेंद्र नारायण सिंह पंचतत्व में विलीन हो चुके हैं, लेकिन मानगो के विकास में उनका योगदान हमेशा जीवित रहेगा। श्राद्ध कर्म के इस पावन अवसर पर टाउन पोस्ट परिवार इस पुण्यात्मा को श्रद्धासुमन अर्पित करता है।


