
जमशेदपुर: झारखंड की औद्योगिक नगरी जमशेदपुर में जन-आंदोलनों से जुड़े 11 साल पुराने एक बहुचर्चित मामले में आज जमशेदपुर न्यायालय ने अपना अहम फैसला सुनाया है। वर्ष 2013 में जमशेदपुर उपायुक्त (डीसी) कार्यालय परिसर में जन मुद्दों को लेकर किए गए उग्र धरना-प्रदर्शन और हंगामे के मामले में मुख्य न्यायिक दंडाधिकारी (सीजेएम) की अदालत ने अपना निर्णय दिया। अदालत ने अभियोजन पक्ष द्वारा लगाए गए आरोपों को साबित करने में नाकामी और साक्ष्य के घोर अभाव में पूर्व जिला पार्षद एवं पूर्व नेता किशोर यादव सहित कुल पांच लोगों को बाइज्जत बरी कर दिया है। इस फैसले से आरोपियों और उनके समर्थकों को लंबी कानूनी लड़ाई के बाद बड़ी राहत मिली है।
क्या था 2013 का वह बहुचर्चित धरना-प्रदर्शन मामला?
यह पूरा मामला 4 जनवरी 2013 का है। उस दिन जन समस्याओं और स्थानीय मुद्दों को लेकर सैकड़ों की संख्या में कार्यकर्ता और आम लोग जमशेदपुर उपायुक्त कार्यालय के समक्ष एकत्रित हुए थे। इस दौरान अपनी मांगों को लेकर भारी धरना-प्रदर्शन किया जा रहा था, जिसने बाद में हंगामे का रूप ले लिया था। प्रशासन के कामकाज में बाधा उत्पन्न होने और भीड़ के बेकाबू होने के कारण यह मामला सीधे पुलिस के संज्ञान में आया था और एक बड़ी कानूनी प्रक्रिया की शुरुआत हुई थी।
लिपिक की शिकायत पर बिष्टुपुर थाने में दर्ज हुई थी प्राथमिकी
उपायुक्त कार्यालय में हुए इस भारी हंगामे और प्रदर्शन के बाद, प्रशासन की ओर से कड़ी कानूनी कार्रवाई की गई थी। उस समय उपायुक्त कार्यालय में पदस्थापित लिपिक अलखेन खलको ने इस घटना की लिखित शिकायत दर्ज कराई थी। उनकी शिकायत के आधार पर जमशेदपुर के बिष्टुपुर थाने में भारतीय दंड संहिता (आईपीसी) की गंभीर धाराओं 142, 149, 341 और 504 के तहत प्राथमिकी (एफआईआर) दर्ज की गई थी। इस एफआईआर में पूर्व जिला पार्षद किशोर यादव के साथ-साथ राहुल सिंह, धनंजय सिंह, डी.एन. सिंह और आर.बी. सरन को मुख्य रूप से नामजद आरोपी बनाया गया था।
अदालत में अभियोजन पक्ष नहीं पेश कर सका कोई ठोस साक्ष्य
पिछले ग्यारह वर्षों से यह कानूनी मामला जमशेदपुर की अदालत में चल रहा था। मामले की गहन सुनवाई के दौरान अभियोजन पक्ष की ओर से आरोप साबित करने के लिए न्यायालय के समक्ष कुल तीन गवाहों को प्रस्तुत किया गया था। लेकिन, लंबी जिरह और बयानों के दौरान गवाहों की गवाही में स्पष्टता का अभाव नजर आया। अभियोजन पक्ष घटना में इन पांचों आरोपियों की सीधी संलिप्तता और उन पर लगाए गए आपराधिक आरोपों को साबित करने के लिए कोई भी ठोस और अकाट्य साक्ष्य अदालत के सामने पेश करने में पूरी तरह विफल रहा।
बचाव पक्ष के वकीलों की जोरदार दलीलें आईं काम
इस हाई-प्रोफाइल मामले में बचाव पक्ष के अधिवक्ताओं ने बेहद मजबूती से अपना पक्ष रखा। बचाव पक्ष की ओर से अदालत में अधिवक्ता सुधीर कुमार पप्पू, बविता जैन, धर्मेंद्र सिंह निकू और दीपा सिंह ने बहुत ही प्रभावी और तार्किक बहस पेश की। उन्होंने गवाहों के बयानों में खामियां निकालीं और अदालत को यह विश्वास दिलाने में सफल रहे कि उनके मुवक्किलों के खिलाफ लगाए गए आरोप निराधार हैं और घटना में उनकी प्रत्यक्ष संलिप्तता साबित नहीं होती है।
फैसले के बाद आरोपियों और समर्थकों में छाई खुशी की लहर
दोनों पक्षों की लंबी बहस और दलीलों को विस्तार से सुनने के बाद, मुख्य न्यायिक दंडाधिकारी की अदालत ने यह पाया कि आरोपियों के खिलाफ पर्याप्त और विश्वसनीय साक्ष्य मौजूद नहीं हैं। इसी आधार पर अदालत ने न्यायहित में फैसला सुनाते हुए किशोर यादव, राहुल सिंह, धनंजय सिंह, डी.एन. सिंह और आर.बी. सरन को सभी आरोपों से दोषमुक्त करार दिया। इतने सालों बाद अदालत से आए इस राहत भरे फैसले के बाद संबंधित पक्षों और उनके समर्थकों में भारी संतोष और खुशी का माहौल देखा गया।


