
जमशेदपुर: देश में बढ़ते इलेक्ट्रॉनिक कचरे के वैज्ञानिक समाधान और पर्यावरण संरक्षण की दिशा में जमशेदपुर स्थित सीएसआईआर-राष्ट्रीय धातुकर्म प्रयोगशाला (CSIR-NML) ने एक और ऐतिहासिक सफलता हासिल की है। सीएसआईआर-एनएमएल ने नई दिल्ली स्थित प्रतिष्ठित कंपनी M/s R2E Greentech Private Limited के साथ पुरानी, खराब और अनुपयोगी हो चुकी लिथियम-आयन बैटरियों (Lithium-ion Batteries) के पुनर्चक्रण (रिसाइक्लिंग) के लिए एक महत्वपूर्ण समझौता ज्ञापन (MoU) पर हस्ताक्षर किया है।

18 जून 2026 को संपन्न हुआ यह समझौता प्रयोगशाला स्तर पर विकसित अत्याधुनिक स्वदेशी तकनीक के हस्तांतरण और उसके बड़े पैमाने पर व्यावसायीकरण (Commercialization) पर केंद्रित है। इस रणनीतिक साझेदारी को भारत में वैज्ञानिक बैटरी कचरा प्रबंधन, दुर्लभ व मूल्यवान पदार्थों की शत-प्रतिशत पुनर्प्राप्ति और ‘सर्कुलर इकोनॉमी’ (Circular Economy) को मजबूत करने की दिशा में एक गेम-चेंजर कदम माना जा रहा है।
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आधुनिक जीवन का आधार और भविष्य की सबसे बड़ी चुनौती
आज के डिजिटल और औद्योगिक युग में इलेक्ट्रिक वाहनों (EVs), पोर्टेबल इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों, स्मार्टफोन, लैपटॉप, पावर टूल्स और नवीकरणीय ऊर्जा भंडारण प्रणालियों (Renewable Energy Storage Systems) के तेजी से बढ़ते उपयोग के कारण लिथियम-आयन बैटरियां मानव जीवन का एक अनिवार्य हिस्सा बन चुकी हैं। देश को कार्बन मुक्त बनाने और स्वच्छ ऊर्जा को बढ़ावा देने में इन बैटरियों का अमूल्य योगदान है।
परंतु, इस सिक्के का दूसरा पहलू यह है कि अपना निश्चित उपयोगी जीवन (Lifespan) समाप्त होने के बाद ये बैटरियां एक गंभीर कचरा प्रबंधन चुनौती बन जाती हैं। यदि इनका वैज्ञानिक और सुरक्षित तरीके से निपटान या पुनर्चक्रण नहीं किया जाता, तो यह पर्यावरण के लिए एक बहुत बड़ा खतरा साबित हो सकती हैं। इसी गंभीर समस्या को भांपते हुए सीएसआईआर-एनएमएल ने अपनी शोधित तकनीक को R2E Greentech के सहयोग से औद्योगिक और व्यावसायिक स्तर तक पहुंचाने का बीड़ा उठाया है।
दुर्लभ खनिजों का खजाना: आयात पर निर्भरता कम करेगी यह स्वदेशी तकनीक
सीएसआईआर-एनएमएल द्वारा विकसित यह विशिष्ट रिसाइक्लिंग तकनीक उपयोग समाप्त हो चुकी लिथियम-आयन बैटरियों के भीतर से लिथियम, कोबाल्ट, मैंगनीज, निकेल, कॉपर (तांबा), एल्यूमिनियम और ग्रेफाइट जैसे अत्यधिक महत्वपूर्ण और महंगे पदार्थों की सुरक्षित पुनर्प्राप्ति करने में पूरी तरह सक्षम है। ये सभी तत्व आज के समय में नए बैटरी निर्माण, एयरोस्पेस, रक्षा उपकरण, इलेक्ट्रॉनिक विनिर्माण और स्वच्छ ऊर्जा से जुड़े कई रणनीतिक क्षेत्रों के लिए कच्चे माल के रूप में अत्यंत उपयोगी हैं।
भारत के संदर्भ में यह तकनीक रणनीतिक रूप से बेहद महत्वपूर्ण है क्योंकि हमारे देश में लिथियम और कोबाल्ट जैसी कई महत्वपूर्ण व रणनीतिक धातुओं के प्राकृतिक संसाधन बेहद सीमित हैं। वर्तमान में घरेलू उद्योगों की मांग को पूरा करने के लिए इन धातुओं की एक बहुत बड़ी मात्रा विदेशों से महंगे आयात के माध्यम से पूरी की जाती है। ऐसे में, उपयोग समाप्त बैटरियों का वैज्ञानिक पुनर्चक्रण इन महत्वपूर्ण पदार्थों के लिए एक बेहतरीन वैकल्पिक ‘द्वितीयक संसाधन’ (Secondary Resource) के रूप में काम करेगा। इससे बहुमूल्य धातुओं की वैश्विक बर्बादी रुकेगी और भारत की राष्ट्रीय संसाधन सुरक्षा (Resource Security) को अभूतपूर्व मजबूती मिलेगी।
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देश के शीर्ष वैज्ञानिकों और औद्योगिक दिग्गजों की मौजूदगी में हुआ समझौता
इस ऐतिहासिक समझौता ज्ञापन (MoU) पर सीएसआईआर-एनएमएल के निदेशक डॉ. संदीप घोष चौधुरी की गरिमामयी उपस्थिति में दोनों पक्षों द्वारा आधिकारिक हस्ताक्षर किए गए। इस महत्वपूर्ण अवसर पर देश के जाने-माने वैज्ञानिक और प्रशासनिक अधिकारी भी उपस्थित रहे, जिनमें मुख्य रूप से शामिल थे:
डॉ. मनीष कुमार झा: मुख्य वैज्ञानिक एवं परियोजना प्रमुख (बैटरी रिसाइक्लिंग तकनीक के विकास में केंद्रीय भूमिका)
डॉ. संजय कुमार: प्रमुख, धातु निष्कर्षण एवं पुनर्चक्रण प्रभाग
जय शंकर शरण: नियंत्रक प्रशासन (CoA)
डॉ. एस.के. पाल: प्रमुख, अनुसंधान योजना एवं व्यवसाय विकास
डॉ. अंकुर शर्मा, डॉ. वीणा कुमारी एवं डॉ. अंजनी कुमार साहू: प्रयोगशाला के वरिष्ठ वैज्ञानिक एवं अधिकारी
R2E Greentech Private Limited की ओर से कंपनी के निदेशक अखिलेश नंदकिशोर दुबे और हरीश कुमार पांडेय ने अपनी टीम का प्रतिनिधित्व किया। इस अवसर पर कंपनी के निदेशकों ने एनएमएल की तकनीक पर पूर्ण भरोसा जताते हुए कहा कि यह साझेदारी भारत में एक जिम्मेदार, सुरक्षित, पर्यावरण-अनुकूल और बड़े औद्योगिक स्तर पर लागू किए जा सकने वाले बैटरी पुनर्चक्रण तंत्र के विकास में मील का पत्थर साबित होगी। यह अनूठा सहयोग स्पष्ट करता है कि देश के वैज्ञानिक ज्ञान को उपयोगी व्यावसायिक समाधान में बदलने के लिए अनुसंधान संस्थानों और निजी उद्योगों की आपसी साझेदारी कितनी आवश्यक है।
वैश्विक और राष्ट्रीय स्तर पर उपयोग समाप्त लिथियम-आयन बैटरियों के भयावह आंकड़े
भारत सहित पूरी दुनिया में जिस तीव्र गति से लिथियम-आयन बैटरियों का उपभोग बढ़ रहा है, उसके परिणाम स्वरूप आने वाले वर्षों में उपयोग समाप्त और पुरानी हो चुकी बैटरियों का अंबार लगने की संभावना है। वैश्विक स्तर पर किए गए विभिन्न तकनीकी और औद्योगिक अनुमानों के अनुसार, वर्ष 2030 से 2031 के आसपास पूरी दुनिया में पुरानी लिथियम-आयन बैटरियों की मात्रा लगभग 11 मिलियन मीट्रिक टन प्रतिवर्ष के डरावने आंकड़े तक पहुंच सकती है।
यदि भारत की बात करें, तो यहां भी इलेक्ट्रिक वाहनों के तेजी से बढ़ते बाजार और सौर ऊर्जा ग्रिडों के लिए ऊर्जा भंडारण प्रणालियों के विस्तार के कारण बैटरी कचरे का ग्राफ बहुत तेजी से ऊपर जा रहा है। कुछ राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय शोध अनुमानों के अनुसार, भारत में वर्ष 2035 तक लगभग 2 मिलियन टन लिथियम-आयन बैटरी कचरा उत्पन्न होने की प्रबल संभावना है। इतने बड़े पैमाने पर पैदा होने वाले कचरे का प्रबंधन अगर आज से ही सही और वैज्ञानिक ढंग से नहीं किया गया, तो भविष्य में यह संभालना नामुमकिन हो जाएगा।
कचरा नहीं, यह है ‘शहरी खदान’: आर्थिक और पर्यावरणीय पहलू
बढ़ता हुआ बैटरी कचरा केवल एक पर्यावरणीय समस्या नहीं है, बल्कि यह आर्थिक दृष्टिकोण से मूल्यवान संसाधनों की एक बहुत बड़ी हानि भी है। उपयोग समाप्त लिथियम-आयन बैटरियों के भीतर जो लिथियम, कोबाल्ट, निकेल, मैंगनीज जैसी धातुएं मौजूद रहती हैं, उनका अंतर्राष्ट्रीय बाजार में आर्थिक मूल्य बहुत अधिक है।
यदि ऐसी बैटरियों को कचरे के ढेरों में खुले में फेंक दिया जाए, लैंडफिल में डंप कर दिया जाए या स्थानीय कबाड़ियों द्वारा बिना किसी सुरक्षा के आग लगाकर जलाया जाए, तो ये मूल्यवान संसाधन हमेशा के लिए नष्ट हो जाते हैं। इसके साथ ही, बैटरियों के भीतर मौजूद अत्यधिक खतरनाक रासायनिक और विषैले घटक अनियंत्रित होकर आग लगने का गंभीर खतरा पैदा करते हैं, जिससे मिट्टी और भूजल का भारी प्रदूषण होता है। यह स्थिति वहां काम करने वाले असंगठित श्रमिकों और आसपास रहने वाले आम समुदायों के स्वास्थ्य के लिए अत्यंत जानलेवा साबित हो सकती है।
यही कारण है कि अब दुनिया भर के विशेषज्ञ बैटरी कचरे को केवल ‘कचरा’ मानने के बजाय इसे एक महत्वपूर्ण ‘शहरी खदान’ (Urban Mine) और द्वितीयक संसाधन के रूप में देखने की वकालत कर रहे हैं। वैश्विक बैटरी बाजार वर्ष 2030 तक सैकड़ों अरब डॉलर के आंकड़े को पार करने की दिशा में अग्रसर है और इसी के समानांतर बैटरी पुनर्चक्रण बाजार भी बहुत तेजी से फल-फूल रहा है। वैज्ञानिक पुनर्चक्रण के माध्यम से इन उपयोग समाप्त बैटरियों से मूल्यवान पदार्थों का 95% से अधिक हिस्सा वापस प्राप्त किया जा सकता है। इससे प्राकृतिक खदानों पर से दोहन का दबाव कम होगा, पर्यावरण सुरक्षित रहेगा और भविष्य के नए बैटरी निर्माण के लिए उद्योगों को स्वदेशी कच्चे माल की अनवरत उपलब्धता सुनिश्चित होगी।
सतत विकास लक्ष्यों (SDGs) और सर्कुलर इकोनॉमी को बढ़ावा
सीएसआईआर-एनएमएल और R2E Greentech की यह संयुक्त पहल वैश्विक स्तर पर स्वीकृत सतत उपभोग और उत्पादन की अवधारणा को पूरी तरह से जीवंत करती है। यह सीधे तौर पर संयुक्त राष्ट्र के सतत विकास लक्ष्य 12 (SDG 12) से जुड़ी हुई है, जो जिम्मेदार उपभोग और उत्पादन पर केंद्रित है। उपयोग समाप्त बैटरियों का वैज्ञानिक तरीके से पुनर्चक्रण करके इन दुर्लभ और मूल्यवान पदार्थों को फिर से उत्पादन के मुख्य चक्र में वापस लाया जा सकेगा। इससे कचरे की मात्रा न्यूनतम हो जाएगी और प्राकृतिक संसाधनों का इष्टतम उपयोग संभव होगा।
इसके अलावा, यह समझौता ज्ञापन सतत विकास लक्ष्य 17 (SDG 17) की मूल भावना को भी पुरजोर तरीके से प्रदर्शित करता है, जिसमें सतत विकास के लक्ष्यों को हासिल करने के लिए वैश्विक और स्थानीय ‘साझेदारी’ को सबसे महत्वपूर्ण माध्यम बताया गया है। शोध संस्थान और निजी उद्योग की यह जुगलबंदी राष्ट्रीय और पर्यावरणीय हित में एक आदर्श उदाहरण पेश करती है।
अनौपचारिक क्षेत्र का औपचारिकरण और आगे की राह
यह समझौता भारत में बैटरी कचरा पुनर्चक्रण क्षेत्र के औपचारिकरण (Formalization) की दृष्टि से भी अत्यधिक क्रांतिकारी माना जा रहा है। वर्तमान में भारत के भीतर इलेक्ट्रॉनिक कचरे (E-Waste) और पुरानी बैटरियों का एक बहुत बड़ा हिस्सा अभी भी असंगठित और अनौपचारिक संग्रहण, डिसमेंटलिंग और पारंपरिक प्रसंस्करण नेटवर्क से जुड़ा हुआ है। हालांकि इन स्थानीय कबाड़ नेटवर्कों की संग्रहण क्षमता और जमीनी पहुंच बहुत मजबूत है, लेकिन उनके पास आधुनिक वैज्ञानिक सुविधाएं, उन्नत सुरक्षा व्यवस्था और प्रदूषण नियंत्रण के कोई पुख्ता उपाय उपलब्ध नहीं होते हैं। इसके कारण न केवल श्रमिकों को गंभीर स्वास्थ्य जोखिम उठाने पड़ते हैं, बल्कि मूल्यवान संसाधनों की सही और पूरी रिकवरी भी नहीं हो पाती है।
सीएसआईआर-एनएमएल और R2E Greentech के बीच हुआ यह ऐतिहासिक सहयोग अनुसंधान और वास्तविक बाजार के बीच की खाई को पाटने का काम करेगा। एनएमएल ने अपनी उन्नत वैज्ञानिक प्रयोगशाला में जो ज्ञान और हाइड्रो-मेटालर्जिकल तकनीक विकसित की है, R2E Greentech उसे एक विशाल औद्योगिक प्लांट का रूप देकर व्यावहारिक व्यावसायिक उपयोग में तब्दील करेगी। ऐसी साझेदारियां देश में स्वच्छ तकनीक (Clean-Tech), कचरा प्रबंधन और सर्कुलर इकोनॉमी के क्षेत्र में काम कर रहे नए स्टार्ट-अप्स और अन्य उद्योगों को भी एक नई दिशा और प्रोत्साहन प्रदान करेंगी।
संक्षेप में कहा जाए तो, सीएसआईआर-एनएमएल और R2E Greentech के बीच हुआ यह एमओयू भारत को आत्मनिर्भरता की ओर ले जाने वाला एक बेहद सकारात्मक और दूरदर्शी कदम है। उचित और समयबद्ध क्रियान्वयन के माध्यम से यह स्वदेशी तकनीक सुरक्षित ई-कचरा प्रबंधन, दुर्लभ धातुओं की 100% स्वदेशी रिकवरी और भारतीय बैटरी उद्योग को वैश्विक स्तर पर प्रतिस्पर्धी बनाने में पूर्णतः सहायक सिद्ध होगी।


