

जमशेदपुर।
रवि कुमार झा
एक ओर राज्य सरकार अंधविश्वास खत्म करने के लिए गांवो मे कई योजना चला रही है । वही ग्रामीणो अंधविश्वास खत्म होने का नाम नही ले रहा है। झारखंड के पूर्वी सिहभुम जिला के करनडीह मे जैसे क्षेत्र मे आज भी आदिवासी समाज के लोग बच्चो के पेट से बीमारियो न होने के लिए उन्हे गरम लोहे से दागा जाता है। इसे चिड़ी दाग के नाम से लोग जानते है। वो भी मकर संक्राती के दुसरे दिंन गांव के वैध के द्वारा इस प्रकार की रस्म पुरी की जाती है। इस दिन आदिवासी समाज के लोग एक साल से इंतजार करते है। सबसे बड़ी बाते तो कई बच्चे इसके आदी हो गए है । उन्हे इस प्रकार दगाने मे कोई दर्द का अहसास नही होता है। यह प्रथा करनडीह के कई गांवो मे अलग अलग वैध के द्वारा किया जाता है।
इस सदर्भ मे वैध नकुल गोप ने कहा कि यह परपंरा. सदियों पुरानी है इस सभ्यता में मकर पर्व के दुसरे दिन छोटे बच्चो को लोहे के छेड़ से पेट में दगा जाता है। उन्होने कहा कि इस तरह छोटे बच्चो के पेट में दागने से बच्चो को पेट सम्बन्धी बीमारी नहीं होती है। उन्होने कहा कि इसमे खास बात यह है कि बच्चो को सुबह सुरज उगने के पहले आना पड़ता है। उन्होने कहा कि लडकियो के लिए ये सबसे ज्यादा फायदेमंद रहता है।
वही अपनी तीन वर्ष की अपनी बेटी रानी हेम्ब्रम को लगातार तीन बर्षो से दाग लगा रहे दिगबंर हेम्ब्रम का कहना है कि वे अपनी बेटी के जन्म के बाद से ही हर साल इस दिन आकर पेट को दागवाते है ताकि मेरी बेटी स्वस्थय रह सके। इस प्रकार की बाते बड़े बुर्जूग भी कहते है।
–पहले गौटे मे आग लगाया जाता हैआग लाल हो जाने पर बासुली को गरम किया जाता है। जब बासुली गरम हो जाता है तो बच्चो को खटिया मे सोला दिया जाता है। वैध के द्वारा बच्चो के नाभी मे सरसो का तेल लगाया जाता है उसके बाद गरम रड (बसुली ) से दागा जाता है।

