
सरायकेला।

वैश्विक महामारी और भारत में घोषित राष्ट्रीय आपदा कोरोना वायरस संक्रमण का खतरा ऐसा बना हुआ है कि अब इंसान तो इंसान भगवान भी इसके संक्रमण से अछूते नहीं है ,सरायकेला जिले के आदित्यपुर के पौराणिक दिण्डली शिव मंदिर में विगत 202 सालों से आयोजित हो रहे चड़क पूजा पर भी इस संक्रमण का खतरा इस साल देखने को मिला जहां 202 साल में पहली सादगी पूर्ण तरीके से सिर्फ पूजा संपन्न कराया गया।
दिण्डली का यह पौराणिक शिव मंदिर आज भी अपने पौराणिक इतिहास काल को संजोए हुए हैं। 1818 से लगातार यहां प्रतिवर्ष जून के दूसरे सप्ताह में पढ़ने वाले सोमवार और मंगलवार को चड़क पूजा और मेले का आयोजन किया जाता रहा है, लेकिन इस साल पहली बार 202 साल के इतिहास में बिना मेले और भीड़भाड़ के सिर्फ परंपरा का निर्वहन करते हुए पूजा संपन्न कराया गया, वह भी सामाजिक दूरी नियमों का पालन करते हुए , चड़क पूजा से जुड़े कई रोचक गाथाएं यहां आज भी प्रचलित हैं ,मान्यता है कि आज से तकरीबन 202 साल पूर्व 1818 में दिण्डली गांव में भयंकर ,अकाल और महामारी फैली, बिना बारिश हर ओर सुखाड़ पड़ा था ।ऐसे में लोगों ने यहां के पौराणिक शिव मंदिर में विशेष पूजा अर्चना की और मन्नतें मांगी, उस वक्त कई भक्तों ने अपने शरीर को भी नुकीले कील से छिदवाए और भगवान शिव के प्रति गहरी आस्था प्रकट की, जिसके बाद से ही यहां प्रतिवर्ष अच्छी बरसात होने लगी ,और अकाल का नामोनिशान भी मिट गया ।आज 202 साल बाद भी कुछ इसी तरह की परिस्थितियां बनी है, लेकिन इस बार यहां महामारी के रूप में कोरोना का साया दिखा। लोगों ने मन्नते मांग यहां पूजा की और भगवान से कहा कि इस कोरोना संकट को जल्द दूर करें, ताकि अगले साल भव्य तरीके से नाचते झूमते गाते मेले के आयोजन के साथ आराध्य का पूजा कर सके, स्थानीय वार्ड पार्षद राजरानी महतो बताती हैं कि 1818 में जिस परंपरा की शुरुआत की गई, वह आज भी कायम है जबकि पूजा कमेटी के अध्यक्ष लालटू महतो ने कहा कि संक्रमण के खतरे को देखते हुए सरकार के नियमों का पालन करते हुए ही पूजा संपन्न कराया गया है।

