
शराब की अवैध भट्ठियां टूटती हैं, आरोपी उड़ जाते हैं, आखिर हर छापेमारी से पहले कैसे मिल जाती है खबर?
बुरूडीह में 250 किलो जावा महुआ नष्ट, दो भट्टियां ध्वस्त; फिर भी पुलिस के हाथ खाली, सवालों के घेरे में कार्रवाई का तरीका
मृत्युंजय बर्मन
Gamharia News
काण्ड्रा थाना क्षेत्र के बुरूडीह पंचायत में आज सुबह पुलिस ने अवैध देसी शराब निर्माण के खिलाफ एक और बड़ी कार्रवाई का दावा किया। पुलिस ने नदी किनारे संचालित एक अवैध शराब निर्माण केंद्र को ध्वस्त करते हुए करीब 250 किलोग्राम जावा महुआ नष्ट कर दिया और दो अवैध भट्टियों को तोड़ दिया। लेकिन इस पूरी कार्रवाई में एक भी आरोपी पुलिस के हत्थे नहीं चढ़ा।
यहीं से शुरू होता है वह सवाल, जो अब जनता के बीच चर्चा नहीं बल्कि संदेह का विषय बन चुका है।आखिर हर बार भट्ठियां मिल जाती हैं, शराब बनाने का सामान मिल जाता है, लेकिन आरोपी नहीं मिलते। ऐसा क्यों?

एक बार संयोग, हर बार नहीं
अवैध शराब निर्माण कोई ऐसा काम नहीं है जो मशीनों से अपने-आप चलता हो। जावा महुआ तैयार करना, भट्टियां जलाना, शराब बनाना और उसकी आपूर्ति करना, इन सबके पीछे लोग होते हैं। फिर जब पुलिस छापेमारी करती है तो हर बार मौके से सिर्फ सामान ही क्यों मिलता है?
बुरूडीह की घटना कोई पहली नहीं है। इससे पहले हुदू पंचायत के तुमसा गांव और पालोबेड़ा गांव में भी छापेमारी हुई थी। वहां भी पुलिस ने भट्टियां तोड़ीं, सामग्री नष्ट की, लेकिन आरोपी गायब मिले। अब सवाल उठ रहा है कि क्या हर बार आरोपी पुलिस के आने से कुछ मिनट पहले ही फरार हो जाते हैं, या फिर उन्हें पहले से भनक लग जाती है?
जब विशेष निर्देश होता है, तब आरोपी भी पकड़े जाते हैं
दिलचस्प तथ्य यह है कि जब पुलिस अधीक्षक स्तर से किसी विशेष स्थान पर केंद्रित कार्रवाई का निर्देश मिलता है, तब कई मामलों में आरोपी भी गिरफ्तार हो जाते हैं। लेकिन सामान्य अभियान के दौरान अक्सर केवल भौतिक सामग्री नष्ट होने की खबर सामने आती है।
इस पैटर्न ने स्थानीय लोगों के मन में कई सवाल पैदा कर दिए हैं। लोगों का कहना है कि यदि पुलिस को भट्ठियों का स्थान पता है, तो वहां काम करने वाले लोगों की पहचान भी कोई रहस्य नहीं हो सकती।
अवैध भट्ठियां सबको पता है, फिर भी कारोबार जारी है
ग्रामीण क्षेत्रों में खुलेआम चर्चा है कि अवैध शराब निर्माण के अड्डे कोई एक-दो दिन में नहीं बनते। महीनों और वर्षों तक एक ही इलाके में यह कारोबार चलता है। ऐसे में यह मानना कठिन है कि स्थानीय तंत्र को इसकी जानकारी नहीं होगी।
लोग सवाल पूछ रहे हैं कि यदि पुलिस वास्तव में चाहे तो क्या इन अड्डों को हमेशा के लिए बंद नहीं किया जा सकता? यदि बार-बार छापेमारी के बावजूद वही कारोबार फिर शुरू हो जाता है, तो कार्रवाई की वास्तविक प्रभावशीलता पर प्रश्नचिह्न लगना स्वाभाविक है।
भट्ठियां टूटती हैं, कारोबार नहीं
जमीनी हकीकत यह है कि भट्ठियां दोबारा बन सकती हैं, जावा महुआ फिर तैयार हो सकता है और शराब निर्माण का काम नए स्थान पर शुरू हो सकता है। लेकिन जब तक इस कारोबार को संचालित करने वाले लोगों की गिरफ्तारी नहीं होगी, तब तक ऐसी कार्रवाइयों का असर सीमित ही रहेगा।
बुरूडीह की ताजा छापेमारी के बाद जनता के बीच सबसे बड़ा सवाल यही गूंज रहा है, क्या पुलिस की कार्रवाई अवैध शराब कारोबार की जड़ों तक पहुंच रही है, या फिर हर बार केवल भट्ठियां तोड़कर अभियान की औपचारिकता पूरी की जा रही है?


