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Home » JAMSHEDPUR NEWS दो दशक बाद भी बरकरार है लावारिस कुत्तों का आतंक, 2007 के हाई कोर्ट के आदेश आज भी फाइलों में दफन—जवाहरलाल शर्मा
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JAMSHEDPUR NEWS दो दशक बाद भी बरकरार है लावारिस कुत्तों का आतंक, 2007 के हाई कोर्ट के आदेश आज भी फाइलों में दफन—जवाहरलाल शर्मा

BJNN DeskBy BJNN DeskMay 27, 2026No Comments4 Mins Read
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जमशेदपुर.

शहर में लावारिस कुत्तों का आतंक कोई नई बात नहीं है. आज से करीब 20-21 वर्ष पूर्व जब नितिन मदन कुलकर्णी जमशेदपुर के उपायुक्त (DC) हुआ करते थे, उस समय भी यह मुद्दा गरमाया हुआ था. उस दौर में भी राहगीर, छोटे बच्चे, आम जनता, देर रात ड्यूटी से लौटने वाले पत्रकार और गश्त लगाने वाले पुलिसकर्मी इन लावारिस कुत्तों के खौफ के साये में जीने को मजबूर थे. अफ़सोस की बात यह है कि दो दशक बीत जाने के बाद भी स्थिति जस की तस बनी हुई है. लावारिस कुत्तों के मुद्दे उठाते हुए मानवाधिकार कार्यकर्ता जवाहरलाल शर्मा ने ये बातें कही हैं.

​सुप्रीम कोर्ट द्वारा हाल ही में लावारिस कुत्तों को लेकर दिए गए नए आदेशों के बाद, जमशेदपुर के वरिष्ठ मानवाधिकार कार्यकर्ता जवाहरलाल शर्मा ने अतीत के उन महत्वपूर्ण कानूनी दस्तावेजों और तथ्यों को जनता के सामने रखा है, जो यह साबित करते हैं कि प्रशासन की सुस्ती और तथाकथित ‘कुत्ता प्रेमियों’ की वजह से यह समस्या आज तक नहीं सुलझ पाई.

​वर्ष 2006 में रांची हाई कोर्ट में दायर हुई थी जनहित याचिका (PIL)

जवाहरलाल शर्मा ने प्रेस रिलीज के माध्यम से बताया कि ​सड़कों पर बढ़ते कुत्तों के हमलों को देखते हुए उन्होंने साल 2006 में रांची हाई कोर्ट में एक जनहित याचिका (PIL) दायर की थी. ‘जवाहरलाल शर्मा बनाम झारखंड राज्य और अन्य’ नामक इस याचिका में पैदल चलने वालों और दोपहिया वाहन चालकों की सुरक्षा तथा आम जनता के जीवन की रक्षा का मुद्दा प्रमुखता से उठाया गया था.

​इस याचिका पर सुनवाई करते हुए माननीय उच्च न्यायालय ने 18 जनवरी 2007 को एक महत्वपूर्ण फैसला सुनाया था. कोर्ट ने स्थानीय प्रशासन को लावारिस कुत्तों की नसबंदी करने और उनके लिए अलग से ‘डॉग पॉन्ड’ (Dog Pond) बनाने का सुझाव दिया था.

​’कुत्ता प्रेम’ की आड़ में जमीन का खेल? घाघीडीह की जगह मरीन ड्राइव पर अटकी थी बात

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प्रेस रिलीज में शर्मा ने बताया है कि ​प्राप्त जानकारी के अनुसार, उस समय प्रशासन द्वारा घाघीडीह जेल के पीछे खाली पड़ी सरकारी जमीन पर कुत्तों के लिए पॉन्ड बनाने की योजना तैयार की जा रही थी. लेकिन शहर के कुछ तथाकथित ‘कुत्ता प्रेमियों’ को यह मंजूर नहीं था. ​जवाहरलाल शर्मा का आरोप: “ये कुत्ता प्रेमी चाहते थे कि उन्हें सर्किट हाउस के पास मरीन ड्राइव जैसी प्राइम लोकेशन (कीमती जमीन) पर प्लॉट मिले, ताकि वहां पॉन्ड बनाया जा सके. ऐसे लोगों की इस सोच के पीछे की मंशा को आसानी से समझा जा सकता है. क्या यह कुत्ता प्रेम था या फिर बेशकीमती जमीन से अपना निजी फायदा उठाने की साजिश?”
​नतीजतन, यह विवाद बढ़ता गया और लावारिस कुत्तों को शहर से दूर पुनर्वासित करने की योजना ठंडे बस्ते में चली गई.

​हाई कोर्ट ने दिए थे ये सख्त निर्देश, बनाई गई थी कमेटी

​18 जनवरी 2007 के अपने फैसले में माननीय उच्च न्यायालय ने समस्या के समाधान के लिए कई कड़े निर्देश जारी किए थे:

संयुक्त स्थानीय समिति का गठन: कोर्ट के निर्देश पर एक विशेष कमेटी का गठन किया गया था, जिसमें याचिकाकर्ता जवाहरलाल शर्मा को भी परामर्श देने के लिए सदस्य के रूप में शामिल किया गया था.

​नगर निकाय कानूनों का कड़ाई से पालन: कोर्ट ने बिहार/झारखंड म्युनिसिपल एक्ट, 1922 की धारा 349 के तहत स्थानीय प्रशासन को लावारिस जानवरों के नियंत्रण और जन सुरक्षा सुनिश्चित करने की शक्ति दी थी.

दवाइयों की उपलब्धता: कोर्ट ने आदेश दिया था कि सभी सरकारी अस्पतालों में एंटी-रेबीज (Anti-Rabies) इंजेक्शन और जीवन रक्षक दवाइयों का पर्याप्त स्टॉक हमेशा उपलब्ध रहना चाहिए ताकि पीड़ितों को तुरंत इलाज मिल सके.

​आज भी जस की तस है स्थिति, जनता पूछ रही सवाल

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​जवाहरलाल शर्मा का कहना है कि आज एक बार फिर सुप्रीम कोर्ट ने इस गंभीर विषय पर संज्ञान लिया है, इसलिए पिछले तथ्यों को जनता के समक्ष लाना बेहद जरूरी है. दो दशकों से प्रशासन की उदासीनता और कुछ संगठनों के अड़ंगे के कारण जनता आज भी सड़कों पर असुरक्षित घूम रही है. अब समय आ गया है कि नगर निकाय और जिला प्रशासन पुराने और नए अदालती आदेशों को कड़ाई से लागू करे, ताकि जमशेदपुर की सड़कों को लावारिस कुत्तों के आतंक से मुक्त कराया जा सके.

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