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Home » चाईबासाृ -जंगल आंदोलन के प्रमुख नेता थे शहीद देवेंद्र मांझी
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चाईबासाृ -जंगल आंदोलन के प्रमुख नेता थे शहीद देवेंद्र मांझी

BJNN DeskBy BJNN DeskOctober 14, 2017Updated:October 14, 2017No Comments4 Mins Read
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*बीड़ी श्रमिको के लिए भी किये थे बड़ा आंदोलन

रामगोपाल जेना।

चक्रधरपुर : देवेन्द्र माझी की पुण्य तिथि। देवेन्द्र माझी के अनुयाइयों के लिए संकल्प व प्रतिबद्धता की प्रतिमूíत स्व. माझी को याद करने, उनके सपनों को पूरा करने का संकल्प दोहराने व श्रद्धांजलि अíपत करने का दिन। आज का दिन हर साल की तरह बलिदान की कहानी दोहराता है। याद दिलाता है उस आखिरी चिराग को जिसके बाद अंधेरा नहीं उजाला है। स्व. देवेन्द्र माझी को जंगल में रहने वाले आदिवासियों की आवाज कहा जाता था। जंगल आंदोलनों की श्रंखला में कोल्हान- पोड़ाहाट का जंगल आंदोलन तक ऐतिहासिक परिघटना है। जब-जब जंगल आन्दोलन की बात होगी, तब-तब देवेन्द्र माझी का नाम इतिहास के पन्नों का गौरव बनेगा। एक गरीब आदिवासी किसान परिवार में 15 सितम्बर 1947 को देवेन्द्र माझी ने जन्म लिया था। तीन भाइयों एवं छह बहनों में सबसे छोटे देवेन्द्र माझी के सर से पांच वर्ष की बाल्यावस्था में ही पिता का साया उठ गया। इनके भाई कालीदास माझी जो कि एक जुझारू स्वतंत्रता सेनानी थे, एक दुर्घटना में चल बसे। मां कुनी माझी के कमजोर कंधों पर परिवार के भरण-पोषण का भार आ गया। विषम परिस्थितियों ने बालक देवेन्द्र माझी को साहसी जुझारू एवं विद्रोही स्वभाव का बना दिया। व्यवस्था की असमानता से क्षुब्ध होकर देवेन्द्र माझी हायर सेकेन्ड्री की पढ़ाई पूरी करने के बाद आगे पढ़ने का इरादा त्यागते हुए सामाजिक समानता की प्रतिस्थापना हेतु संगठन बनाकर साथियों को गोलबन्द करने लगे। कोल्हान, पोड़ाहाट के चप्पे-चप्पे पर पैदल घूमते हुए लोगों को जगाया व क्रांति के लिए उद्वेलित किया। इसी दौरान उनकी मुलाकात ट्रेन में एक भगोड़े नक्सली असीम भट्टाचार्य से हुई। असीम भट्टाचार्य कुछ दिनों के लिए देवेन्द्र माझी के घर में रहे और बाद में उन्हें अपने साथ ले गए। जहां देवेन्द्र माझी को ‘लाल किताब‘ का अध्ययन करने का मौका भी मिला। किन्तु उन्हें लाल आन्दोलन रास नहीं आया। उन्होंने जिन उद्देश्यों को लेकर अपना सामाजिक जीवन आरम्भ किया था, उनके सिद्धांतों और विचारों में फर्क नजर आया। इसलिए वे चन्द दिनों के बाद ही इनसे अलग होकर पुन: कोल्हान-पोड़ाहाट के लोगों के बीच चले आए। सर्वप्रथम 1969 में बीड़ी श्रमिकों को संगठित कर कंपनियों के विरुद्ध आन्दोलन का सूत्रपात किया। जिसकी प्रतिक्रिया में बीड़ी कंपनियों के दबाव पर देवेन्द्र माझी को सर्वप्रथम 1971 में बांझीकुसुम गांव की घेरेबन्दी कर गिरफ्तार किया गया। गिरफ्तारी के पश्चात इन्हें हजारीबाग जेल भेज दिया गया। जेल में इनकी मुलाकात शिबू सोरेन से हुई, जो अपने क्षेत्र में महाजनों के विरुद्ध आन्दोलन किए जाने की वजह से जेल में थे। इन दोनों ने संयुक्त रूप से अपने अपने क्षेत्र में झारखंड अलग प्रांत हासिल करने के लिए कार्य करने का संकल्प लिया। इधर देवेन्द्र माझी की गिरफ्तारी से क्षुब्ध बीड़ी मजदूरों ने बीड़ी से लदे तीन ट्रकों को बांझीकुसुम गांव के ही समीप जलाकर राख कर दिया। रिहा होने के बाद उन्होंने जंगलों में बसे मूलवासियों के नाम जमीन नियमित करवाने हेतु सरकार के विरुद्ध जोरदार आन्दोलन छेड़ दिया। आन्दोलन जंगल की समतल भूमि पर झाड़ियां साफ कर खेती करने को प्रेरित करने हेतु किया गया था। लेकिन स्वार्थी तत्वों ने मौके का फायदा उठाकर सैकड़ों एकड़ जंगल के पेड़ काट डाले और इसका इल्जाम देवेन्द्र माझी के सर मढ़ दिया गया। भूमिगत देवेन्द्र माझी को उस वक्त गिरफ्तार कर लिया गया जब वे अपनी बीमार वृद्धा मां से मिलने घर आए। इनके समर्थकों ने गुवा के जंगलों का सर्वेक्षण करने आए पदाधिकारियों के विरुद्ध प्रदर्शन किया। इसके जवाब में 8 सितम्बर 1980 को बिहार पुलिस ने बेरहमी से गोली चलाकर दर्जन भर निरपराधों को मार डाला। तीर धनुष पर ¨सहभूम में प्रतिबंध लगा दिया गया। फिर भी आन्दोलन रोका नहीं जा सका। आन्दोलन के नेतृत्वकर्ता देवेन्द्र माझी की 14 अक्टूबर 1994 को हत्यारों ने गोईलकेरा हाट बाजार में हत्या कर दी गई। हत्यारों ने बारूदी धमाके से उनके शरीर का तो अन्त कर दिया, किन्तु उनके सिद्धांतों एवं विचारों की अनुगूंज आज भी सारंडा-कोल्हान के जंगलों में सुनाई देती है।

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आनंद किशोर बिहार झारखंड न्यूज़ नेटवर्क में कॉपी एडिटर के रूप में कार्यरत हैं। वे सामाजिक मुद्दों, जनहित और मानवीय संवेदनाओं से जुड़ी खबरों पर विशेष रुचि रखते हैं। आनंद का उद्देश्य कमजोर और जरूरतमंद लोगों की आवाज को सही मंच तक पहुंचाना है। वे निष्पक्ष, सरल और प्रभावशाली पत्रकारिता में विश्वास रखते हैं।

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