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Home » विश्व मरुस्थलीकरण एवं सूखा रोकथाम दिवस :स्वस्थ मिट्टी ही स्वस्थ समाज और समृद्ध अर्थव्यवस्था की आधारशिला है- डॉ ईशा बर्मन
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विश्व मरुस्थलीकरण एवं सूखा रोकथाम दिवस :स्वस्थ मिट्टी ही स्वस्थ समाज और समृद्ध अर्थव्यवस्था की आधारशिला है- डॉ ईशा बर्मन

BJNN DeskBy BJNN DeskJune 16, 2026No Comments3 Mins Read
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डॉ. ईशा बर्मनपीएच.डी., आईआईटी (ISM) धनबाद
लीड इंजीनियर, – अनुसंधान एवं विकास, Engeotech
पर्यावरण अभियंता एवं जल-अपशिष्ट जल प्रबंधन विशेषज्ञ
डॉ. ईशा बर्मन
पीएच.डी., आईआईटी (ISM) धनबाद
लीड इंजीनियर, – अनुसंधान एवं विकास, Engeotech
पर्यावरण अभियंता एवं जल-अपशिष्ट जल प्रबंधन विशेषज्ञ

मरुस्थलीकरण केवल रेगिस्तान के फैलने का नाम नहीं, बल्कि भूमि की उत्पादकता में गिरावट, मिट्टी की उर्वरता का ह्रास, जल स्रोतों का सूखना और पारिस्थितिकी तंत्र के कमजोर पड़ने की प्रक्रिया है। यही कारण है कि आज यह समस्या झारखंड जैसे वन एवं खनिज संपदा से समृद्ध राज्यों के लिए भी चिंता का विषय बनती जा रही है।

झारखंड की पहचान उसके घने जंगलों, नदियों और खनिज संसाधनों से है। किंतु अनियोजित भूमि उपयोग, वनों की कटाई, खनन गतिविधियों, मृदा अपरदन तथा जलवायु परिवर्तन के प्रभावों के कारण कई क्षेत्रों में भूमि की गुणवत्ता प्रभावित हो रही है। विशेष रूप से खनन प्रभावित क्षेत्रों, बंजर भूमि तथा वर्षा पर निर्भर कृषि क्षेत्रों में भूमि क्षरण की समस्या तेजी से उभर रही है।

मरुस्थलीकरण को केवल भूमि की समस्या के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए। यह जल सुरक्षा, खाद्य सुरक्षा, जैव विविधता संरक्षण और ग्रामीण आजीविका से सीधे जुड़ा हुआ विषय है। जब मिट्टी अपनी उत्पादकता खोती है, तो कृषि प्रभावित होती है, जल का भू-भंडारण कम होता है और ग्रामीण समुदायों की आर्थिक स्थिति पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है।

वैज्ञानिक अध्ययनों से स्पष्ट है कि स्वस्थ मिट्टी केवल फसल उत्पादन का माध्यम नहीं होती, बल्कि वह कार्बन को संग्रहित करने, वर्षा जल को संरक्षित करने और स्थानीय पारिस्थितिकी संतुलन बनाए रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है। भूमि क्षरण बढ़ने पर ये सभी सेवाएँ प्रभावित होती हैं, जिससे सूखे की घटनाएँ और गंभीर हो सकती हैं।

झारखंड में वर्षा की कुल मात्रा पर्याप्त होने के बावजूद अनेक क्षेत्रों में गर्मियों के दौरान जल संकट देखने को मिलता है। इसका प्रमुख कारण केवल कम वर्षा नहीं, बल्कि वर्षा जल का पर्याप्त संचयन न होना, भूमि की जल धारण क्षमता में कमी तथा प्राकृतिक जलग्रहण क्षेत्रों का क्षरण है। यदि भूमि स्वस्थ होगी तो वह पानी को अधिक समय तक संचित रख सकेगी और सूखे की तीव्रता स्वतः कम होगी।

आज आवश्यकता है कि मरुस्थलीकरण नियंत्रण को विकास योजनाओं का अभिन्न हिस्सा बनाया जाए। इसके लिए वनीकरण, देशी प्रजातियों का वृक्षारोपण, वर्षा जल संचयन, जलग्रहण क्षेत्र विकास, खनन प्रभावित भूमि का पुनर्वास तथा टिकाऊ कृषि पद्धतियों को बढ़ावा देना होगा। विशेष रूप से समुदाय आधारित भूमि पुनर्स्थापन कार्यक्रमों को प्राथमिकता दी जानी चाहिए।

संयुक्त राष्ट्र का इस वर्ष का संदेश भी यही है कि भूमि केवल संसाधन नहीं, बल्कि जीवन का आधार है। यदि हम भूमि को पुनर्जीवित करते हैं, तो हम जल, खाद्य, जैव विविधता और जलवायु, चारों की सुरक्षा एक साथ कर सकते हैं। भूमि क्षरण केवल पर्यावरणीय समस्या नहीं है, यह भविष्य की जल सुरक्षा, खाद्य सुरक्षा और सतत विकास की चुनौती है। स्वस्थ मिट्टी ही स्वस्थ समाज और समृद्ध अर्थव्यवस्था की आधारशिला है।

विश्व मरुस्थलीकरण एवं सूखा रोकथाम दिवस हमें यह याद दिलाता है कि भूमि का संरक्षण केवल सरकार की जिम्मेदारी नहीं, बल्कि हम सभी का दायित्व है। यदि आज हम अपनी मिट्टी, जल और वन संसाधनों को बचाने के लिए ठोस कदम उठाते हैं, तो आने वाली पीढ़ियों को एक अधिक सुरक्षित, हरित और समृद्ध भविष्य दे सकेंगे।
क्योंकि जब भूमि बचती है, तभी जीवन बचता है।

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