विबग्योर विद्यार्थियों ने क्रिसमस और नव वर्ष पर खुशियां बिखेरी!

विबग्योर के विद्यार्थी  “उद्देश्य के लिए सैंटा बने”

आस-पास के अनाथालयों में रहने वाले सुविधाओं से वंचित बच्चों को खिलौने, कपड़े और खाद्य पदार्थ देकर उन्हें क्रिसमस की खुशियों में शामिल किया

इंदौर: यह त्योहारों का मौसम है। क्रिसमस और नव वर्ष आशा और आनंद के त्योहार हैं। ये खुशियां बांटने का मौसम है किसी को तोहफ़े देने से मिलने वाली खुशी का जश्न मनाने का मौसम है। इस दौर में जहां पूरी दुनिया में नफ़रत और बेचैनी फैली हुई है, तो ऐसे में हमें अपने बच्चों को यह सिखाना बहुत ज़रूरी हो जाता है कि वे एक-दूसरे के प्रति दया और करुणा का भाव रखें। विबग्योर में, हम अपने विद्यार्थियों को विभिन्न सामाजिक मामलों पर छोटी-सी उम्र में ही संवेदनशील बनाते हैं, ताकि वे भविष्य में दुनिया के संवेदनशील नागरिक बनें।   

खुशियां फैलाने और त्योहारों के मौसम का आनंद दूसरों से साझा करने के लिए विबग्योर राइज़ के विद्यार्थी इस सप्ताह “आस” (अवेयरनेस टू द सोसाइटी) अनाथालय में गए। विद्यार्थियों का यह दौरा “साझा करने की खुशियों का जश्न” मनाने की गतिविधि के तहत आयोजित किया गया था। हमारे विद्यार्थियों ने अनाथालय के बच्चों को तोहफ़ों के रूप में किताबें और स्टेशनरी सामान, ब्लैंकेट, खिलौने, कपड़े आदि दिए। विबग्योर के  स्टाफ ने आस के बच्चो को ‘जीवन में खेल का महत्त्व’ और ‘सिंगल यूज प्लास्टिक का उपयोग घटाने’ के विषय में मार्गदर्शन भी किया। “आस अनाथालय” के बच्चों ने विबग्योर के विद्यार्थियों का स्वागत अपनी प्यारी-प्यारी मुस्कानों के साथ किया। इस दौरान माहौल बहुत आनंदमय हो गया था और खुशियों से भर गया था। सभी एक-दूसरे के साथ गर्मजोशी से मिल-जुल रहे थे। विद्यार्थियों ने एक-दूसरे से बातचीत की और अपने अनुभव भी साझा किए।

विबग्योर-इंदौर के प्रिंसिपल डॉक्टर अभिषेक शर्मा ने कहा, “यहां तोहफ़े नहीं, बल्कि देने की भावना मायने रखती है। क्रिसमस की पहली शाम को हर बच्चा यह उम्मीद करता है कि उसे सैंटा से कोई तोहफ़ा मिले। हमारे विद्यार्थियों को किसी उद्देश्य के लिए सैंटा बनाने का यह सुनहरा मौका था। विबग्योर के विद्यार्थी “आस अनाथालय” के बच्चों के साथ समय बिता कर बहुत खुश थे। इस गतिविधि का मकसद था सभी को अपने तरीके से तोहफ़े देने के लिए प्रेरित करना और देने की भावना का जश्न मानना। विबग्योर में, हम विद्यार्थियों को शुरुआती उम्र में ही विभिन्न सामाजिक मामलों और उनके परिवेश के प्रति संवेदनशील बनाने की शुरुआत करते हैं।”

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