
‘गुरू ब्रह्मा, गुरू वि-ुनवजयणु, गुरू देवो महे-रु39यवरा!’ अर्थात् गुरू ही ब्रह्मा,
यानि सृजक, वि-ुनवजयणु यानि पालनहार और -िरु39याव यानि संहारक है। यह -रु39यलोक
आगे कहता है कि ‘गुरू का स्थान सबसे ऊपर है और मैं पूरे आदर के
साथ उनके सामने नतमस्तक हूँ’। 5 जुलाई को गुरू पूर्णिमा है। यह
एक पारंपरिक त्यौहार है, जिसमें -िरु39या-ुनवजयय अपने गुरू को सम्मान देते हैं,
उनकी पूजा करते हैं और उनके प्रति आभार व्यक्त करते हैं। इस दिन
को और यादगार बनाने के लिये इस ‘गुरू पूर्णिमा’ पर आइये, हम
-िरु39याक्षक कृ-ुनवजयण के-रु39याव आम्बेडर को याद करें, जिन्होंने न केवल सबसे
अपवादी नेता डाॅ. बी. आर. आम्बेडकर का मार्गद-रु39र्यान किया, बल्कि
उन्हें अपना सरनेम ‘आम्बेडकर’ भी दिया।
अक्सर कहा जाता है कि -िरु39याक्षक ही विद्यार्थी के भवि-ुनवजयय को आकार देते
हैं। कुछ ही -िरु39याक्षक होते हैं, जो बच्चों के प्रति सच्ची भावना,
परवाह और चिंता रखते हैं, निस्वार्थ होकर प्रेम और प्रोत्साहन
देते हैं। बाबासाहब के जीवन में ऐसे ही प्रेरक और लगन वाले
-िरु39याक्षक थे उनके गुरूजी कृ-ुनवजयण के-रु39याव आम्बेडकर। 1800 के द-रु39याक में
भारत की -िरु39याक्षा व्यवस्था बदल रही थी और उस समय बाबासाहब अपने
स्कूल में चुनौतियों का सामना कर रहे थे। स्कूल की अथाॅरिटी
और -िरु39याक्षक उनके साथ अच्छा व्यवहार नहीं करते थे। बाबासाहब की
मदद करने के लिये उनके गुरूजी ने बड़ा कदम उठाते हुए उन्हें
अपना सरनेम ‘आम्बेडकर’ दिया, ताकि जाति की पहचान से छुटकारा मिल सके।
बाबासाहब का जन्म से नाम भीमराव रामजी सकपाल था और उनके पिताजी
ने स्कूल में उनका नाम भीमराव अम्बाडावेकर लिखवाया था। यह
उपनाम रत्नागिरी जिले में स्थित उनके पैतृक गांव ‘अम्बाडावे’ से
लिया गया था। हालांकि स्कूल में उनके गुरूजी कृ-ुनवजयण के-रु39याव
आम्बेडकर ने उन्हें अपना सरनेम दिया और फिर वे भीमराव
आम्बेडकर कहलाए।
बाबासाहब के जीवन में उनके -िरु39याक्षक के अतुलनीय योगदान के बारे
में एण्डटीवी के एक महानायक डाॅ. बी. आर. आम्बेडकर में
रामजी सकपाल की भूमिका निभा रहे जगन्नाथ निवानगुणे ने कहा,
‘‘-िरु39याक्षक को गुरू भी कहा जाता है और वही आपको जीवन की
विभिन्न अवस्थाओं का सामना करने के लिये तैयार करता है।
बाबासाहब का सौभाग्य था कि उन्हें गुरू के रूप में कृ-ुनवजयण के-रु39याव

आम्बेडकर मिले, जिन्होंने नोटिस किया कि बाबासाहब एक अच्छे
विद्यार्थी हैं और फिर कॅरियर के लिये उनका मार्गद-रु39र्यान किया।
बाबासाहब महत्वाकांक्षी थे और ज्यादा से ज्यादा सीखने की इच्छा
रखते थे। अन्य विद्यार्थियों द्वारा अच्छा व्यवहार नहीं किये जाने के
बावजूद बाबासाहब ने बड़ी गंभीरता और लगन से प-सजय़ाई की।
बाबासाहब की प्रतिभा और ज्यादा से ज्यादा सीखने की भूख से प्रसन्न
होकर उनके -िरु39याक्षक कृ-ुनवजयण के-रु39याव आम्बेडकर ने उनका सरनेम बदलकर
आम्बेडकर रख दिया।’’
एण्डटीवी का ‘एक महानायक डाॅ. बी. आर. आम्बेडकर‘ बाबासाहब
की प्रेरक गाथा है, जिसमें पाँच व-ुनवजर्या की आयु से लेकर भारतीय
संविधान के प्रधान -िरु39याल्पकार बनने तक की उनकी यात्रा को दिखाया गया
है।
‘एक महानायक डाॅ. बी. आर. आम्बेडकर‘ के सभी नये एपिसोड
देखें, 13 जुलाई 2020 से, रात 8ः30 बजे, केवल एण्डटीवी पर!

