
मृत्युंजय बर्मन, गम्हरिया
विकास और औद्योगीकरण के नाम पर जमीन गंवाने वाले कालिंदी परिवारों का सब्र गुरुवार को आखिर टूट गया। सरायकेला-खरसावां जिले के कांड्रा स्थित अमलगम स्टील एंड पावर लिमिटेड कम्पनी के मुख्य गेट पर महिलाएं, पुरुष और बच्चे धरने पर बैठ गए और कंपनी के साथ-साथ सरकार तथा जिला प्रशासन के खिलाफ जमकर नाराजगी जाहिर की।
धरनास्थल पर गूंज रहे नारों में सबसे बड़ा सवाल यही था कि आखिर “विकास” किसका हुआ? जिन परिवारों की जमीन पर उद्योग खड़ा हुआ, आज वही परिवार रोजगार और सम्मान के लिए दर-दर भटकने को मजबूर हैं। प्रदर्शनकारियों का आरोप है कि वर्ष 2003 में रोजगार और बेहतर भविष्य का सपना दिखाकर उनकी जमीन ली गई थी। उस समय नौकरी देने और प्रभावित परिवारों को बसाने के बड़े वादे किए गए, लेकिन वर्षों बीत जाने के बाद भी कई परिवारों को न नौकरी मिली और न ही कोई स्थायी सहारा।
लोगों का कहना है कि कंपनी ने जमीन तो ले ली, लेकिन जमीन देने वालों की जिंदगी को अंधेरे में छोड़ दिया। फैक्ट्री की चिमनियां लगातार धुआं उगलती रहीं, उत्पादन बढ़ता रहा, मुनाफा बढ़ता रहा, मगर विस्थापित परिवारों के घरों में बेरोजगारी और निराशा ही बढ़ी। प्रदर्शनकारियों ने आरोप लगाया कि पूंजीपतियों के हितों की रक्षा करने में प्रशासन हमेशा सक्रिय रहा, लेकिन गरीब और विस्थापित परिवारों की पीड़ा सुनने के लिए उसके पास कभी समय नहीं रहा।
धरने पर बैठे लोगों ने कहा कि यदि जिला प्रशासन चाहता, तो वर्षों पहले इस समस्या का समाधान निकल सकता था। लेकिन हर बार सिर्फ आश्वासन देकर मामले को ठंडे बस्ते में डाल दिया गया। आंदोलनकारियों का आरोप है कि सरकार और प्रशासन की चुप्पी ने यह साबित कर दिया है कि व्यवस्था में गरीबों की जमीन की कीमत तो है, लेकिन गरीबों की जिंदगी की कोई कीमत नहीं।
प्रदर्शनकारियों ने दो टूक कहा कि अब वे केवल आश्वासन नहीं सुनेंगे। उनकी मांग है कि प्रभावित परिवारों को तत्काल रोजगार दिया जाए, अन्यथा उनकी जमीन वापस की जाए। चेतावनी दी गई कि यदि जल्द समाधान नहीं हुआ तो आंदोलन को और उग्र किया जाएगा।


