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Home » रांंची -छठी जेपीएससी की नियुक्तियों में सर्वोच्च न्यायालय के न्याय- निर्णयों की अनदेखी : रघुवर
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रांंची -छठी जेपीएससी की नियुक्तियों में सर्वोच्च न्यायालय के न्याय- निर्णयों की अनदेखी : रघुवर

BJNN DeskBy BJNN DeskSeptember 30, 2020No Comments5 Mins Read
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सामान्य श्रेणी के अभ्यर्थियों से अधिक अंक लाने वाले ओबीसी अभ्यर्थी फेल

रांची। भारतीय जनता पार्टी के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष एवं राज्य के पूर्व मुख्यमंत्री रघुवर दास ने छठी जेपीएससी की नियुक्यिों में सर्वोच्च न्यायालय के न्याय-निर्णयों की अनदेखी करने का आरोप हेमंत सरकार पर लगाया है। श्री दास ने एक प्रेस विज्ञप्ति में कहा है कि हाल में प्रकाशित हुए छठी जेपीएसपी के अंतिम परिणाम में सामान्य श्रेणी के अभ्यर्थियों से अधिक अंक लाने वाले ओबीसी अभ्यर्थियों को फेल घोषित कर दिया।
पूर्व मुख्यमंत्री ने राज्य विधानसभा चुनावों में झारखंड मुक्ति मोर्चा द्वारा झारखंड के मूलवासी-आदिवासी और पिछड़ों के हित में काम करने का वायदा करने के प्रतिकूल राज्य सरकार द्वारा आचरण करने का आरोप लगाया है. उन्होंने जेपीएससी की प्रारंभिक परीक्षा की चर्चा करते हुए कहा कि जब प्रारंभिक परीक्षा परिणाम प्रकाशित हुआ था तब भी सामान्य से अधिक अंक लाने वाले ओबीसी अभ्यर्थियों को फेल कर दिया गया था। उनसे कम अंक लाने वाले अनारक्षित सामान्य अभ्यर्थी पास घोषित कर दिये गये थे। इन बिसंगतियों की जानकारी उनके नेतृत्व में गठित भाजपा सरकार को मिली तो सरकार ने न्यायोचित निर्णय लिया था। इसके बाद ओबीसी के वैसे अभ्यर्थी जिनके अंक सामान्य श्रेणी के अभ्यर्थियों से अधिक थे, उन्हें उतीर्ण किया गया था और वे मुख्य परीक्षा में भाग ले सके थे।
इस संबंध में श्री दास ने माननीय सर्वोच्च न्यायालय द्वारा इंदिरा साहनी मामले को लेकर हाल तक के न्याय-निर्णयों की चर्चा की है। उन्होंने कहा है कि माननीय सर्वोच्च न्यायालय ने साफ कहा है कि हर श्रेणी के अभ्यर्थी सबसे पहले तो सामान्य श्रेणी का भी अभ्यर्थी माना जाता है। अत: यदि आरक्षित श्रेणी के अभ्यर्थी के अंक सामान्य श्रेणी के अभ्यर्थी से अधिक हो तो वह सामान्य श्रेणी में शामिल माना जायेगा। माननीय सर्वोच्च न्यायालय ने ऐसा नहीं किये जाने की परिस्थिति को सामान्य श्रेणी के लिए 50 प्रतिशत आरक्षण दिये जाने की संज्ञा दी है अथवा इसे कम्युनल अवार्ड कहा है और अपने अनेक न्याय-निर्णय में ऐसी प्रक्रिया को गलत ठहराया है।
पूर्व मुख्यमंत्री ने जेपीएससी के अंतिम परिणामों के लिए अभ्यर्थियों के  कट-ऑफ माक्र्स निर्धारण की चर्चा करते हुए कहा है कि अंतिम परिणाम के लिए जेनरल श्रेणी के अभ्यर्थियों का कट-ऑफ माक्र्स 600 और ओबीसी वर्ग के अभ्यर्थियों के लिए 621 निर्धारित किया गया। यानी वैसे सभी ओबीसी वर्ग के अभ्यर्थी जिनको 600 से लेकर 621 अंक प्राप्त हुए। मतलब अंतिम जनरल श्रेणी के अभ्यर्थी से अधिक अंक लाने वाले उन सभी को असफल घोषित किया गया है।
उन्होंने राज्य सरकार की आलोचना करते हुए कहा है कि जेपीएससी के अंतिम परिणाम ने हेमंत सरकार आदिवासी-मूलवासी पिछड़ा वर्ग विरोधी चेहरे को बेनकाब कर दया है. श्री सोरेन ने झारखंड के सैकड़ों मूलवासी पिछड़ा वर्ग के अभ्यर्थियों को राज्य की प्रशासनिक सेवा में नियुक्ति से वंचित कर दिया। यह इनके साथ सरकार का घोर अन्याय है।
पूर्व मुख्यमंत्री ने राज्य सरकार द्वारा आदिवासी, मूलवासी एवं पिछड़े वर्ग के साथ किये गये इस अन्याय को रेखांकित करते हुए कहा है कि छठी जेपीएससी की नियुक्ति प्रक्रिया ने यह स्पष्ट कर दिया है कि सरकार ने सरकारी नौकरियों में सामान्य श्रेणी में आने वाली 10 प्रतिशत आबादी के लिए 50 प्रतिशत पद और 52 प्रतिशत की जनसंख्या वाले पिछड़े वर्ग को 14 प्रतिशत आरक्षण निर्धारित कर दिया है। संभव है कि राज्य सरकार के सलाहकारों ने सरकार को बाद के सर्वोच्च न्यायालय के उस न्याय-निर्णय का हवाला देकर गुमराह किया हो, जिसमें माननीय न्यायालय ने सिर्फ इतना ही कहा है कि यदि आरक्षित वर्ग अथवा पिछड़े वर्ग का अभ्यर्थी उस वर्ग को दी गयी अन्य सुविधाओं जैसे उम्र क्षांति आदि का लाभ लेता है तो उसे साधारण श्रेणी में शामिल नहीं किया जा सकता है। लेकिन 600 अंक से 621 अंक लाने वाले वाले पिछड़े वर्ग के अभ्यर्थियों में वैसे कई अभ्यर्थी होंगे, जिनकी योग्यता तथा उम्र जनरल श्रेणी के अभ्यर्थियों के बराबर होगी और उन्होंने अपने आवेदन में ‘पिछड़ा वर्गÓ लिखने के अलावा और कोई बड़ा गुनाह नहीं किया है।
श्री दास ने 2019 में सर्वोच्च न्यायालय के उपरोक्त निर्णय के आलावा अनेक पूर्व तथा बाद के फैसलों का उल्लेख करते हुए कहा है कि उन फैसलों में यह स्पष्ट किया गया है कि किसी भी श्रेणी का अभ्यर्थी सबसे पहले साधारण श्रेणी का अभ्यर्थी तो माना ही जायेगा, साथ ही उसके माक्र्स अथवा मेरिट रैंक साधारण श्रेणी के अभ्यर्थी से ऊपर हो तो वह सामान्य श्रेणी में गिना जायेगा ताकि एक योग्य तथा अधिक अंक लाने वाले अभ्यर्थी को सिफ इसलिए फेल नहीं कर दिया जाय कि वह आरक्षित श्रेणी का है, परंतु छठी जेपीएससी की नियुक्यिों के मामले में ऐसा ही हुआ है।
पूर्व मुख्यमंत्री ने छठी जेपीएससी की नियुक्ति पर सवाल खड़ा करते हुए कहा है कि जब इस मामले में अनेक वाद माननीय उच्च न्यायालय में लंबित पड़े हैं, तो सरकार को हड़बड़ी में नियुक्तियां करने की क्या वजह थी। यह स्पष्ट तौर पर झारखंड के आदिवासियों और मूलवासियों तथा पिछड़े वर्ग के साथ अन्याय है।

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