मधेपूरा-मधेपुरा में लोक आस्था का महापर्व छठ सम्पन्न,भागलपुर सॆ जुड़ा है छठ का इतिहास

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SANJAY KUMAR SUMAN
संजय कुमार सुमन
मधेपुरा
लोकआस्था का महापर्व छठ आज उदयीमान सूर्य को अर्घ्य देने के साथ संपन्न हो गया।आज सुबह 3 बजे से ही श्रद्धालु जिले के विभिन्न घाटों पर भगवान् भास्कर को अर्घ्य देने के लिए पहंचे।कई भक्तो ने कष्ट काट कर अपनी याचना और मन्नत माँगने के लिये डंड देकर छठ घाट पहुँछ कर भगवान सूर्य को अर्ध्य दिया।भगवान भास्कर को अर्घ्य देने के बाद छठ व्रतियों ने अपना 36 घंटे का निर्जला उपवास गुड़ और अदरक खाकर तोड़ा। इसके बाद व्रतियों ने शरबत पीकर और ठेकुआ- केला का प्रसाद ग्रहण कर पारण किया।
इससे पहले घाटों पर छठ व्रतियों ने लोक गीत गाये और छठी  मां की भी पूजा की।घाट पर अहले सुबह 4 बजे से ही मेले जैसा माहौल नज़र आने लगा। घाट पर बैंड वाले भी छठ गीत के धुन बजा रहे थे।
बताते चले चार दिवसीय छठ महापर्व रविवार को नहाय-खाय के साथ शुरू हुआ था. इसके बाद व्रतियों ने सोमवार को खरना मनाया वहीं मंगलवार को अस्ताचलगामी सूर्य को अर्घ्य दिया गया जबकि सोमवार को व्रतियों ने उदीयमान सूर्य को अर्घ्य देने के बाद पारण किया। कई छठ घाट पर भगवान सूर्य की प्रतिमा भी स्थापित की गई और रात भर भक्ति संगीत का दौर चला।
मालूम हो कि कार्तिक मास की शुक्ल पक्ष की षष्ठी तिथि  भगवान सूर्य को समर्पित है। बिहार और पूर्वांचल के निवासी इस दिन जहां भी होते हैं सूर्य भगवान की पूजा करना और उन्हें अर्घ्य देना नहीं भूलते।
यही कारण है कि आज यह पर्व बिहार और पूर्वांचल की सीमा से निकलकर देश विदेश में मनाया जाने लगा है। चार दिनों तक चलने वाला यह पर्व बड़ा ही कठिन है।
इसमें शरीर और मन को पूरी तरह साधना पड़ता है इसलिए इसे पर्व को हठयोग भी माना जाता है। इस कठिन पर्व की शुरुआत कैसे हुई और किसने इस पर्व को शुरु किया इस विषय में अलग-अलग मान्यताएं हैं।
जैसे,,,
भगवान राम सूर्यवंशी थे और इनके कुल देवता सूर्य देव थे। इसलिए भगवान राम और सीता जब लंका से रावण वध करके अयोध्या वापस लौटे तो अपने कुलदेवता का आशीर्वाद पाने के लिए इन्होंने देवी सीता के साथ षष्ठी तिथि का व्रत रखा और सरयू नदी में डूबते सूर्य को फल, मिष्टान एवं अन्य वस्तुओं से अर्घ्य प्रदान किया।
सप्तमी तिथि को भगवान राम ने उगते सूर्य को अर्घ्य देकर सूर्य देव का आशीर्वाद प्राप्त किया। इसके बाद राजकाज संभालना शुरु किया। इसके बाद से आम जन भी सूर्यषष्ठी का पर्व मनाने लगे।
महाभारत का एक प्रमुख पात्र है कर्ण जिसे दुर्योधन ने अपना मित्र बनाकर अंग देश यानी आज का भागलपुर का राजा बना दिया। भागलपुर बिहार में स्थित है।
अंग राज कर्ण के विषय में कथा है कि, यह पाण्डवों की माता कुंती और सूर्य देव की संतान है। कर्ण अपना आराध्य देव सूर्य देव को मानता था। यह नियम पूर्वक कमर तक पानी में जाकर सूर्य देव की आराधना करता था और उस समय जरुरतमंदों को दान भी देता था। माना जाता है कि कार्तिक शुक्ल षष्ठी और सप्तमी के दिन कर्ण सूर्य देव की विशेष पूजा किया करता था।
अपने राजा की सूर्य भक्ति से प्रभावित होकर अंग देश के निवासी सूर्य देव की पूजा करने लगे। धीरे-धीरे सूर्य पूजा का विस्तार पूरे बिहार और पूर्वांचल क्षेत्र तक हो गया।

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