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Home » जमशेदपुर -हिन्दी शब्दों का महासागर है : प्रोफेसर शुक्ला महांती
शिक्षा-जगत

जमशेदपुर -हिन्दी शब्दों का महासागर है : प्रोफेसर शुक्ला महांती

BJNN DeskBy BJNN DeskSeptember 14, 2020No Comments5 Mins Read
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जमशेदपुर।

बिष्टुपुर स्थित वीमेंस कॉलेज में हिन्दी विभाग द्वारा 14 सितंबर को हिन्दी दिवस के अवसर पर राष्ट्रीय वेब संगोष्ठी का आयोजन किया गया। इक्कीसवीं सदी में हिन्दी : भाषा, साहित्य एवं संस्कृति का परिप्रेक्ष्य विषय पर केन्द्रित इस वेब संगोष्ठी में बनारस, दिल्ली, कोलकाता सहित राँची और जमशेदपुर के वक्ताओं ने ऑनलाइन हिस्सा लिया। गूगल मीट पर सुबह दस बजे से आयोजित कार्यक्रम में प्रधान संरक्षक सह मुख्य आयोजक व वीमेंस कॉलेज की प्राचार्या प्रो. (डॉ.) शुक्ला महांती ने स्वागत और उद्घाटन वक्तव्य दिया। उन्होंने कहा कि दुनिया की किसी भाषा की तुलना में हिन्दी का शब्दकोश अधिक समृद्ध है। यह लगातार बढ़ भी रहा है क्योंकि हिन्दी में एक लचीलापन है जो दूसरी भाषाओं के शब्दों को सहजता से आत्मसात कर लेती है। हिन्दी को आगे बढ़ाने में गाँधी जी की भूमिका का ठीक से मूल्यांकन भी करना चाहिए। उन्होंने हिन्दी को भारतीय आजादी के सपनों की भाषा बनाया। हिन्दी हमारे सपनों की भाषा है। हम हिन्दी में सबसे अधिक सहज और ईमानदार होते हैं।

हिन्दी का भविष्य पाठकीय संस्कृति पर भी निर्भर करेगा : डॉ. महुआ माजी

साहित्यकार, समाजशास्त्री व झारखण्ड राज्य महिला आयोग की पूर्व अध्यक्षा डॉ. महुआ माजी ने कहा कि हिन्दी तभी बढ़ेगी जब हम हिन्दी को जियेंगे। हिन्दी को भी तभी प्राणवायु मिलेगी, जब हिन्दी की बोली-बानी में बात करेंगे। करीब अड़तालीस बोलियों का कोलाॅज है हिन्दी। इसलिए सिर्फ संस्कृत से जोड़कर देखना सही नहीं है। दुनिया भर के बड़े रचनाकारों ने अपनी मातृभाषा को ही अपनी सर्वोत्तम रचनाओं का जरिया बनाया। न्गुगी वाॅन थ्योंगो, पाउलो कोएलो, माइकेल मधुसूदन दत्त, रसूल हमजातोव, गेब्रियल गार्सिया मार्केज, महाश्वेता देवी जैसे लोगों ने मातृभाषा में लिखा। हमें भी हिन्दी से उतनी ही मुहब्बत करनी चाहिए। साहित्यकार कहलाना आसान है, होना नहीं। यह तपस्या है जो भाषा और भावों के बीच लंबे संघर्ष के बाद फलित होती है। हिन्दी को बचाने के लिए पाठकीय संस्कृति को बचाना जरूरी है। बाॅलीवुड में हिन्दी फिल्मों के जरिए मोटी कमाई करने वाले अधिकांश लोग साक्षात्कार के समय अंग्रेजी बोलते हैं। यह शर्मनाक है। हिन्दी को बचाना साझे हिन्दुस्तान को बचाना है।

 

हिन्दी में सबसे अधिक सुरक्षित बहुलतावादी लोकतंत्र : प्रोफेसर प्रभाकर सिंह

काशी हिन्दू विश्वविद्यालय से प्रोफेसर प्रभाकर सिंह ने कहा कि हिंदी भारत की बहुलतावादी संस्कृति का प्रतिनिधित्व करने वाली भाषा है। हिंदी प्रेम, प्रतिरोध और श्रम की भाषा है। हिंदी भाषा और संस्कृति के विकास में महात्मा गांधी, प्रेमचंद और रामविलास शर्मा के द्वारा बताए गए सूत्र आज 21वीं सदी में हिंदी भाषा के विकास के लिए उतने ही उपयोगी है। हिंदी अपनी जनपदीय भाषाओं से तेज ग्रहण करती है और अपना लोकतांत्रिक स्वरूप विकसित करती है। आज जरूरत है मातृभाषाओं और भारतीय भाषाओं के पोषण के साथ हिंदी अपना स्वरूप विकसित करे। हिंदी भाषा जो प्रशासन में शासन में और शोध में प्रयोग हो रही है उसमें बदलाव की जरूरत है। वह आम फहम और रवानगी से भरी होनी चाहिए। हिन्दी के विकास में भारतीय भक्ति आंदोलन और नवजागरण की बड़ी भूमिका रही है।

संगोष्ठी में गूगल मीट और यूट्यूब लाईव स्ट्रीमिंग के जरिए 943 प्रतिभागियों ने शिरकत की। संचालन और धन्यवाद ज्ञापन संगोष्ठी के संयोजक डाॅ. अविनाश कुमार सिंह ने किया। तकनीकी सहयोग ज्योतिप्रकाश महांती और के. प्रभाकर राव ने पूरी तत्परता से किया।

 

भाषा नदी की तरह होती है : डॉ. इन्द्रनील चट्टोराज

राष्ट्रीय धातुकर्म प्रयोगशाला के निदेशक और नगर राजभाषा कार्यान्वयन समिति के पदेन अध्यक्ष डॉ. इन्द्रनील चट्टोराज ने कहा कि हिन्दी या कोई भी भाषा नदी की तरह होती है। वह अपने बहाव में दूसरी भाषाओं के शब्दों को लेती है तो दूसरी भाषाओं को अपने शब्द भी देती है। हिन्दी की शक्ति इसी भाषाई लेनदेन में है। हिन्दी की ध्वन्यात्मकता इसे एक वैज्ञानिक भाषा बनाती है।

 

हिन्दी ही हो आधिकारिक राष्ट्रभाषा : डॉ. अशोक कुमार झा ‘अविचल’

मैथिली परामर्श परिषद्, साहित्य अकादमी के समन्वयक और कोल्हान विश्वविद्यालय के कुलानुशासक डॉ. अशोक कुमार झा ‘अविचल’ ने कहा कि हिन्दी का विकास मैथिली, भोजपुरी, अवधी, मगही, बुंदेलखंडी जैसी बोलियों से खाद पानी लेकर ही हुआ है। इसलिए ये सभी एक ही परिवार की भाषाएँ हैं और सभी चाहती हैं कि सर्वमान्य राष्ट्रभाषा के रूप में हिन्दी को ही आधिकारिक दर्जा मिले। उन्होंने जोर देकर कहा कि हिन्दी की शब्द संपदा में इसकी बोलियों के शब्दों को जितना अधिक शामिल किया जाएगा उतनी ही हिन्दी की संप्रेषणीयता बढ़ेगी। हिन्दी के व्यवहार का एक बड़ा परिवृत्त तैयार हो पाएगा। मातृभाषा और हिन्दी दो अलग दिशाएं नहीं बल्कि पारस्परिक क्रियाएँ हैं। सबके साथ ही सबका विकास हो सकता है।

कार्यक्रम में प्रतिश्रुति प्रकाशन, कोलकाता के प्रबंध निदेशक लक्ष्मण केडिया और राजकमल प्रकाशन, नई दिल्ली की वरिष्ठ प्रकाशक सुमन परमार ने हिन्दी की किताबों के जरिए पाठकीय वृत्त के फैलाव पर बातें रखीं। लक्ष्मण केडिया ने कहा कि हिन्दी किताबों की कीमत कम रखनी चाहिए। इससे इसकी पाठकीयता बढ़ेगी तथा हिन्दी और विकसित हो सकेगी। प्रकाशकों को पुराने लेखकों के साथ युवा हिन्दी लेखकों को भी प्रोत्साहित करना चाहिए। हिन्दी में प्रकाशन केवल उद्योग नहीं है बल्कि हिन्दी के प्रति सांस्कृतिक जवाबदेही भी है। सुमन परमार ने कहा कि हिन्दी की कई ऐसी किताबें हैं जो हिन्दीतर क्षेत्रों में खूब पढ़ी जाती हैं। प्रेमचंद, राहुल सांकृत्यायन, रवीश कुमार जैसे लेखकों ने हिन्दी को लोगों की जुबान पर बैठाया है।

संगोष्ठी में गूगल मीट और यूट्यूब लाईव स्ट्रीमिंग के जरिए 943 प्रतिभागियों ने शिरकत की। संचालन और धन्यवाद ज्ञापन संगोष्ठी के संयोजक डाॅ. अविनाश कुमार सिंह ने किया। तकनीकी सहयोग ज्योतिप्रकाश महांती और के. प्रभाकर राव ने पूरी तत्परता से किया।

 

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आनंद किशोर बिहार झारखंड न्यूज़ नेटवर्क में कॉपी एडिटर के रूप में कार्यरत हैं। वे सामाजिक मुद्दों, जनहित और मानवीय संवेदनाओं से जुड़ी खबरों पर विशेष रुचि रखते हैं। आनंद का उद्देश्य कमजोर और जरूरतमंद लोगों की आवाज को सही मंच तक पहुंचाना है। वे निष्पक्ष, सरल और प्रभावशाली पत्रकारिता में विश्वास रखते हैं।

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