जमशेदपुर।
ईरान और अन्य देशों के बीच चल रहे तनाव और मिसाइल हमलों की खौफनाक तस्वीरों ने पूरी दुनिया को डरा दिया था, लेकिन इसी महायुद्ध के बीच जमशेदपुर का एक जांबाज कैप्टन अपनी सूझबूझ से मौत को चकमा देकर सकुशल अपने घर लौट आया है। करीब डेढ़ महीने तक ईरान के नजदीक होर्मुज जलडमरूमध्य (Strait of Hormuz) के आधिकारिक समुद्री जल मार्ग में अपने मालवाहक जहाज के साथ फंसे रहने वाले मानगो निवासी कैप्टन मनीष ने अदम्य साहस का परिचय दिया है। उनकी इस सुरक्षित वापसी पर पूरे शहर में खुशी की लहर है।
वतन वापसी पर हुआ भव्य स्वागत
डेढ़ महीने के खौफनाक मंजर को पीछे छोड़कर जब कैप्टन मनीष अपने घर जमशेदपुर (मानगो) पहुंचे, तो उनके परिजनों की आंखें छलक उठीं। उनकी सकुशल वापसी की खबर मिलते ही पूर्व भाजपा नेता विकास सिंह उनके आवास पर पहुंचे। विकास सिंह ने कैप्टन मनीष को अंग वस्त्र ओढ़ाकर सम्मानित किया और उनके अदम्य साहस की भूरि-भूरि प्रशंसा की। इस दौरान कैप्टन मनीष ने समंदर के बीच गुजारे उन खौफनाक पलों की रोंगटे खड़े कर देने वाली कहानी साझा की।
बंदरगाह से निकलते ही आसमान से बरसने लगे थे अंगारे
कैप्टन मनीष ने बताया कि वह अपने विशालकाय जहाज में भारी मात्रा में तेल भरकर बंदरगाह से निकले ही थे कि अचानक युद्ध छिड़ गया। जहाज ने समंदर में मुश्किल से 10 किलोमीटर का ही सफर तय किया था कि अचानक आसमान में मिसाइलों की गड़गड़ाहट और धमाकों की तेज रोशनी दिखाई देने लगी। आसमान से अंगारे बरसते देख एक पल के लिए पूरा क्रू दहल गया था, लेकिन जहाज के कैप्टन होने के नाते मनीष ने बिना कोई घबराहट दिखाए तुरंत स्थिति को संभालने का फैसला किया।
जीपीएस और इंटरनेट किया बंद, जहाज में कर दिया था घुप्प अंधेरा
दुश्मन की रडार या किसी भटकी हुई मिसाइल से अपने जहाज को बचाने के लिए कैप्टन मनीष ने सबसे पहले जहाज का जीपीएस (GPS) सिस्टम पूरी तरह से बंद कर दिया। इसके साथ ही पूरी दुनिया से संपर्क तोड़ते हुए जहाज का इंटरनेट कनेक्शन भी तुरंत काट दिया गया। रात के अंधेरे में जहाज किसी की नजर में न आए, इसके लिए जहाज की सभी लाइटें बुझा दी गईं और समंदर के बीचों-बीच लंगर डाल दिया गया। कैप्टन मनीष की इस त्वरित सोच और तकनीकी सूझबूझ ने एक बड़े संभावित खतरे को टाल दिया।
तेल से लदे जहाज पर था महाविनाश का खतरा
इस मालवाहक जहाज पर कैप्टन मनीष सहित कुल 40 क्रू मेंबर सवार थे और सभी की जान की जिम्मेदारी कैप्टन के ही कंधों पर थी। मनीष को सबसे बड़ी चिंता इस बात की सता रही थी कि जहाज में ज्वलनशील तेल इतनी भारी मात्रा में लदा हुआ था कि अगर गलती से भी मिसाइल की एक चिंगारी जहाज पर गिर जाती, तो समंदर में महाविनाश तय था। कैप्टन के अनुसार, विस्फोट इतना भयंकर हो सकता था कि समंदर में 50 किलोमीटर की परिधि में आने वाले सभी जहाज और उपकरण मिनटों में खाक हो जाते।
करीब डेढ़ महीने तक मौत के साये में समंदर के बीच खड़े रहने के बाद, जब युद्ध विराम की स्थिति बनी, तब जाकर कैप्टन मनीष और उनका 40 सदस्यीय क्रू सुरक्षित अपने वतन लौट सका। अपनी जान पर खेलकर क्रू मेंबर्स को सुरक्षित वापस लाने वाले कैप्टन मनीष की यह कहानी आज पूरे जमशेदपुर के लिए गर्व का विषय बन गई है।




