
ANNI AMRITA
अन्नी अमृता
गांधी कभी मरा नहीं करते, गांधी कभी मर नहीं सकते. गांधी जी हम सबके भीतर हैं, हर उस इंसान में हैं, जो बगैर हथियार उठाए अपने हक की आवाज दृढ़ता से बुलंद करता है. यह जो हम धरना-प्रदर्शन करते हैं, बगैर किसी को नुकसान पहुंचाए अपने अधिकारों के लिए जो आवाज उठाते हैं, पैदल मार्च करते हैं, वह क्या है? वही तो ‘गांधीगिरी’ है. आज की पीढ़ी ‘गांधीगिरी’ शब्द का इस्तेमाल करती है और पुरानी पीढ़ी इसे ‘गांधी के सिद्धांत’ कहती है, पर भाव तो एक ही है और वह है, बगैर हिंसा के अन्याय के खिलाफ आवाज उठाना. भारतवासी यह बखूबी करते आ रहे हैं. भले ही नाथूराम गोडसे ने गांधी जी की हत्या कर दी, लेकिन वह शख्स भारतवासियों के मन से गांधी जी को नहीं निकाल पाया. गांधी जी ने भारत के लोगों को अहिंसा रूपी वह हथियार दिया, जिसका इस्तेमाल वे आज भी अपने हक के लिए कर रहे हैं…गांधी जी हर उस इंसान की आत्मा में हैं, जिसे गलत बर्दाश्त नहीं होता, जो गलत के खिलाफ बगैर हथियार उठाए मुखर होता है.
आज जब दुनिया में कई देश युद्ध लड़ रहे हैं, गांधी जी और भी प्रासंगिक हो जाते हैं. भारत में चाहे सरकार किसी की भी हो, प्रधानमंत्री कोई भी हो, यह तय है कि भारत कभी किसी देश पर आक्रमण नहीं करता. भारतवासियों ने ‘गांधीगिरी’ को हृदय से अपनाया है. इसका प्रमाण हाल में ही दिल्ली में हुए जंतर-मंतर पर भी दिखा, जब जेन जी आंदोलन ने देश के शिक्षा मंत्री को इस्तीफा देने पर मजबूर किया. आंदोलन में कुछ छिटपुट उपद्रवी जरूर घुसे और हिंसा की, लेकिन जिस तरह से बच्चों ने पुलिस की लाठी खाते हुए अन्याय के खिलाफ आवाज उठाई, वह पूरी दुनिया ने देखी..जेन जी ने अपने आधुनिक अंदाज़ में नृत्य गीत की मदद से लंबे चले आंदोलन को रूचिकर बनाते हुए संदेश दिया कि वे बगैर हिंसा अपने मुद्दों को उठाकर ‘गांधीगिरी’ के माध्यम से देश के युवाओं की आवाज बुलंद कर सकते हैं. ये वो बच्चे थे जिन्हें Pampered child समझा गया था. सुख-सुविधाओं में पले बढ़े ये युवा तकलीफ सह सकते हैं और दूसरों को नुकसान पहुंचाए बगैर अपने अधिकारों और अन्याय को लेकर आवाज उठा सकते हैं, ऐसी किसी को उम्मीद नहीं थी..लेकिन बच्चों ने साबित कर दिया कि उन्होंने स्कूलों में गांधी जी के बारे में सिर्फ पढ़ा नहीं, सिर्फ लिखा नहीं बल्कि उनको आत्मसात किया और यही भारत की असली संस्कृति है. यह गांधी का देश है.
आजकल कई लोग गांधी जी की आलोचना करने में अपनी शान समझते हैं. ये वही लोग हैं जो मुहल्ले में कुछ गलत होने पर घर से नहीं निकलते, देश के लिए निकलना तो दूर की बात है. मुहल्ला भी छोड़ दीजिए, अपने घरों के अंदर होनेवाले अत्याचार पर भी कुछ न बोल पाने वाले देश को आजादी दिलाने वाले गांधी जी पर सवाल खड़े करते हैं. आजाद भारत में सांस लेने वाले कई लोग इस आजादी की कीमत नहीं समझते, इसलिए ऐसी बातें करते हैं. साथ ही वे कई चीजों से अनजान हैं, ज्ञान का अभाव है, इसलिए एक फैशन के तहत गांधी जी की बुराई करते हैं. गांधी जी कोई मामूली शख्स नहीं थे. वे अच्छी तरह जानते थे कि हथियार व हिंसा की बदौलत अंग्रेजों का मुकाबला करना संभव नहीं है. अंग्रेज हर तरह से मजबूत थे और पूरा देश अंग्रेजों के खिलाफ नहीं लड़ रहा था. कुछ लोग लड़ रहे थे, जिन्हें कुचलना अंग्रेजों के लिए मुश्किल नहीं था. ऐसे में गांधी जी ने सत्य और अहिंसा का सिद्धांत लाकर देशवासियों को एकजुट किया. ज्यादा से ज्यादा लोगों को स्वतंत्रता आंदोलन से जोड़ा ताकि अंग्रेजों के लिए शासन करना असंभव हो जाए..यही हुआ..’जालियांवाला बाग’ हत्याकांड के बाद गांधी जी ने 1 अगस्त 1920 को ‘असहयोग आंदोलन’ का आगाज किया जो देश का सबसे पहला बड़ा जन आंदोलन था. इस दौरान देश भर में अग्रेजों के खिलाफ लोगों ने धरना-प्रदर्शन किया..विदेशी कपड़ों की होली जलाई. सरकारी नौकरियों और सरकारी उपाधियों का बहिष्कार किया गया. बिना हिंसा के इस जन आंदोलन से अंग्रेज घबरा गए थे, लेकिन 1922 में हुए चौरी-चौरा कांड (जिसमें उग्र भीड़ ने पुलिस थाने में आग लगा दी थी और कई पुलिसकर्मी मारे गए थे) से आहत होकर गांधी जी ने आंदोलन वापस ले लिया था. वे अहिंसा के सिद्धांत पर अडिग थे. उन्होंने इस पर कभी समझौता नहीं किया..इससे जनता में संदेश गया कि हिंसा के इस्तेमाल से आंदोलन रूक जाएगा. उधर अंग्रेज महात्मा गांधी के अहिंसक आंदोलन, उनकी नैतिक शक्ति और उन्हें मिले जनसमर्थन से मानसिक दबाव महसूस करते थे. गांधी जी ने अपने सिद्धांत से दर्शाया कि कैसे अहिंसा से बड़े से बड़े साम्राज्यकारी शक्तियों को दबाव में डाला जा सकता है. रिचर्ड एटनबरो की फिल्म ‘गांधी’ का एक दृश्य बहुत मशहूर है, जिसमें अंग्रेजी हुकूमत का एक प्रतिनिधि गांधी जी का रास्ता रोककर कहता है—क्या आप ही मिस्टर गांधी हैं. मुझे अफसोस है कि आप गिरफ्तार किए जाते हैं…गांधी जी कहते हैं—मुझे कोई अफसोस नहीं है….जमानत लेने से इंकार करना, गिरफ्तारी से नहीं डरना, माफी नहीं मांगना, ये सब गांधी जी के वे अहिंसक हथियार थे, जिसके आगे अंग्रेजी सरकार दबाव में आ जाती थी.
1942 में गांधी जी के नेतृत्व में ‘अंग्रेजों भारत छोड़ो’ आंदोलन का जब आह्वान किया गया तो पूरा देश कूद पड़ा. तब उन्होंने ‘करो या मरो’ का नारा दिया. अंग्रेजों के खिलाफ देशव्यापी इस आंदोलन ने आगे चलकर भारत की स्वतंत्रता में एक निर्णायक भूमिका निभाई.
आज के बच्चे जो गांधी जी को और गहराई से जानना चाहते हैं, तो उन्हें बिहार के ‘चंपारण सत्याग्रह’ के विषय में पढ़ना चाहिए. गांधी जी ने भारत में अंग्रेजों के खिलाफ आंदोलन की शुरूआत 1917 में बिहार के चंपारण से की थी जहां अंग्रेज किसानों पर जबरन नील की खेती का दबाव बनाकर उनका आर्थिक शोषण कर रहे थे. ‘तीनकठिया प्रणाली’ के तहत हर एक बीघा जमीन के तीन कट्ठा हिस्से पर जबरन नील की खेती कराई जाती थी. नील की खेती से किसानों की सबसे ऊपजाऊ भूमि बंजर हो जाती थी, जिससे किसान अन्न की पैदावार नहीं कर पाते थे. साथ ही नील की खेती के लिए कम ब्याज पर ऋण दिलाकर किसानों को जिदंगी भर के लिए कर्ज के जाल में फंसा लिया जाता था. इस नारकीय जीवन से मुक्ति दिलाने के लिए गांधी जी का आगमन चंपारण की धरती पर हुआ. अंग्रेजों ने गांधी जी को जिला छोड़ने का आदेश दिया, लेकिन गांधी जी ने आदेश नहीं माना और गिरफ्तारी देने को तैयार हो गए. गांधी जी ने घूम-घूमकर किसानों से बातचीत की और उनके साथ हो रहे अत्याचार के सबूतों को एकत्रित किया. गांधी जी के ‘चंपारण सत्याग्रह’ के फलस्वरूप अंग्रेजों को झुकना पड़ा और ‘तीनकठिया प्रथा’ का अंत हुआ. अंग्रेजों ने एक जांच समिति भी बनाई जिसमें गांधी जी को भी सदस्य बनाया गया. किसानों से अवैध रूप से वसूले गए धन का 25 प्रतिशत हिस्सा भी किसानों को लौटाया गया. गांधीजी के नेतृत्व में अंग्रेजों के अत्याचार के खिलाफ यह किसानों और देशवासियों की बहुत बड़ी जीत थी. एक-एक किसान का दिल जानता था कि गांधी जी ने उनके लिए क्या किया. गांधी जी उनके लिए फरिश्ता से कम नहीं थे. लेकिन ‘चंपारण आंदोलन’ में जिस तरह से गांधी जी ने लोगों को जोड़ा, वह दर्शाता था कि गांधी जी खुद को भगवान बनाने की जगह हर व्यक्ति को जुल्म के खिलाफ खड़े होने के लिए प्रेरित करते थे. यह उनकी सबसे बड़ी ताकत थी. यहां हर व्यक्ति और उसकी आवाज महत्वपूर्ण थी. यही वजह है कि गांधीजी के आह्वान पर देशवासी आंदोलन में कूद पड़ते थे. एकता में कितना बल होता है, गांधी जी यह लोगों को समझाने में सफल रहे थे.
मानवता धर्म हो इंसा का, पथ हो सत्य अहिंसा का—
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तीन कठिया नील खेती, लेलेबा परनावा राम राम हौरे हौरे
इहो डूब गए सबरी किसनवा राम राम हौरे हौरे
दुख के पहाड़ टूटल नाल दिलस देहीया राम राम हौरे हौरे
इहो कबले बीती अमावस के रतिया राम राम हौरे हौरे
साहस हो मन में निश्चय हो, सत्याग्रह का निर्णय हो
चंपारण की धरती पर अब चलल बा फिरंगिया राम राम हौरे हौरे
इ हो गांधी बाबा धौरे जब तिरंगवा राम-राम हौरे-हौरे—
उपरोक्त गीत अमिताभ वर्मा ने लिखी है, जिसे मूल रूप से असम की रहनेवाली भोजपुरी गायिका कल्पना पटवारी ने गांधी के ‘चंपारण सत्याग्रह’ पर बनाए गए अपने म्यूजिक एलबम में ‘चंपारण सत्याग्रह’ के दृश्यों के दर्शाते हुए जिस अंदाज़ में गाया है, वह सुनकर रोंगठे खड़े हो जाते हैं और यह देखकर आंखों से अश्रुधारा निकल पड़ती है कि लोगों ने कितनी तकलीफें सही व किस तरह गांधी जी ने अपने नैतिक ताकत और अहिंसा के हथियार से उन्हें तकलीफ से निजात दिलाई. गांधी जी की ताकत यही है कि असम की लड़की बिहार के मोतीहारी जाकर गांधी जी के त्याग को गीत गाकर समझाती है ताकि नई पीढ़ी अपने अंदर के गांधी जी को सदैव कायम रख सके और जो ‘गांधीगिरी’ नहीं जानते या नहीं समझते, वे उन्हें और बेहतर समझ सकें…फिल्म और संगीत वे माध्यम हैं, जिन्होंने गांधी जी को नई पीढ़ी तक पहुंचाने में अहम भूमिका निभाई है…
आनेवाली पीढ़ियां शायद ही इस बात पर यकीन कर पाएंगी कि हाड़-मांस से बना ऐसा कोई व्यक्ति भी कभी इस धरती पर आया था.
——महान वैज्ञानिक अलबर्ट आइंस्टीन
आजकल सोशल मीडिया का जमाना है.. कोई कुछ भी लिख सकता है, तो लोग गांधी जी पर भी सवाल उठाते हैं..बहुत आसान है, कुछ भी लिख देना, बहुत कठिन है, झंझावातों से गुजरते हुए देश के लिए पूरा जीवन न्योछावर कर देना..गांधी होना कोई मामूली बात नहीं….
रघुपति राघव राजा राम पतित पावन सीता राम
ईश्वर अल्ला तेरो नाम, सबको सन्मति दे भगवान
अन्नी अमृता

