
AA(लेखनी)
जमशेदपुर।


विदेश की चकाचौंध भरी जिंदगी और अच्छी खासी नौकरी छोड़कर भारत वापस लौटा एक नौजवान 2014 के झारखंड विधानसभा चुनाव में पहली बार किस्मत आज़माने पहुंचा. देखने में एक आम खूबसूरत नौजवान .
कई लोगों ने सोचा कि इतने फैशनेबल और हीरो की तरह नज़र आनेवाले ये क्या राजनीति करेंगे? लेकिन इस आम नौजवना ने पहली ही पारी में छक्का लगाकार साबित कर दिया कि वे लंबी रेस के घोड़ा हैं. 2014-विधानसभा चुनाव में बहरागोड़ा विधानसभा से वे पहली बार विधायक बनकर जो निकले तो आज भी वे एक हीरो की तरह अपने रूतबे पर बरकरार हैं. वही सादगी और सहजता आज भी है. उनका आम लोगों से तुरंत घुल मिल जाना उनकी यूएसपी है. लेकिन ऐसा वे सिर्फ मीडिया की चमक धमक में बने रहने के लिए नहीं करते बल्कि वे आम लोगों से दिल से मिलते हैं. उनकी समस्याओं को ज़मीनी धरातल पर रहकर समझते हैं. इन दिनों इसी कड़ी में वे बहरागोड़ा विधानसभा क्षेत्र के सुदूर ग्रामीण इलाकों में लगातार रात्रि प्रवास कर रहे हैं जहां वे अचानक किसी भी ग्रामीण के घर पर रात को रूक जाते हैं, स्थानीय मशहूर भोजन सामग्री जैसे चोप-मूरी वगैरह खाते हैं और बिल्कुल सहजता के साथ लोगों के बीच बैठकर उनकी समस्याएं सुनकर नोट करते हैं. खटिया पर लेटना हो या फिर ग्रामीणों की भीड़ में जाकर उनकी बातें सुनना सबकुछ बड़े ही अपनापन के साथ होता है
. मकसद यही है कि जनता और नेता के बीच कोई दूरी न हो. जनता अपनी बातें कहने, शिकायत रखने को लेकर हिचकिचाए नहीं और सबसे बड़ी बात कि नेता का पैर धरातल पर ही रहे क्योंकि यही जनता हीरो बनाती है और फिर जीरो बनाने में भी कोताही नहीं करती. विधायक कुणाल षाडंगी ये बात अच्छी तरह जानते हैं. विदेश की नौकरी छोड़कर वे अपने घर बहरागोड़ा लौटे तो ये उनका आम लोगों के साथ जुड़े रहने का पैशन ही था, वरना लंदन में खास खास लोगों के साथ उनके दिन गुजर ही रहे थे. लेकिन इस नौजवान को खास रहना पसंद नहीं,. वह आम लोगों के बीच आम रहना पसंद करता है लेकिन यही अदा उन्हें खास बना डालती है. ये तो आनेवाला वक्त बताएगा कि जनता उनकी इस अदा और उनके कार्य से संतुष्ट है या नहीं लेकिन कुणाल षाडंगी ने सुविधाभरी जिंदगी के कुछ दिन छोड़कर अगर गांवों में बिताने की ठानी है और उसे पूरा करने में जुटे हुए हैं तो इस परिपाटी का स्वागत होना चाहिए और प्रत्येक जनप्रतिनिधि को इसे परंपरा बना लेनी चाहिए तभी सही मायनों में लोकतंत्र को हम ज़मीनी धरातल पर खड़ा पा सकते हैं.
वैसे राजनीतिक विरोधी इसे अलग नजरिए से देखते हैं लेकिन बकौल बहरागोडा की जनता ये नायाब लगता है क्योंकि समस्याएं एक दिन में दूर नहीं है सकती पर समस्या साथ बैठकर सुन लेनेवाला नेता दिल में जरूर पैठ बना लेता है।इस लिहाज से झारखंड की इंडस्ट्रीयल राजधानी जमशेदपुर से सौ किलोमीटर दूर बहरागोडा जैसे ग्रामीण परिवेश में खुद को जननेता के रूप में सिंचित करता ये नेता एक उदाहरण तो पेश कर ही रहा है।ऐसे में जब ड्राइंग रूम की पोलिटिक्स देश की राजनीति तय करने की कवायद में जुटी है कुणाल की ऐसी कवायदों पर कम से कम चर्चा तो होनी ही चाहिए।

