रविकांत मिश्रां के कलम से ‘‘आलाप’

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काल कोठरी, जी हा ं, हम सभी के भीतर एक काल कोठरी होती है। मन की दुनिया के बीच वो खामोष
अन्धेरे में डूबा बाहर से अदृष्य भीतर से किसी काले षिलाखण्ड की तरह सख्त, जब हमारी यादों की
रोषनी उस कालकोठरी के भीतर पड़ती है तो षिलाखण्ड पिघलने लगता है। कभी उससे खारा पानी
निकलता है तो कभी जीवन का खालीपन परत दर परत काल कोठरी में कैद रहते हैं जिसमें हमारे रहस्य
हमारे राज़, हमारे अतीत का लेखा जोखा रहता है। कभी-कभी या प्रायः मन की मृत्यु के बाद भी काल
कोठरी की मृत्यु नही ं हो पाती, तब वह हमारी आत्मा को कैदी बना लेता है। मैं भी काल कोठरी का
कैदी हूं। मेरी आधी जिन्दगी काल कोठरी में कैद है और आधी शराब की बोतल में कैद करने की कोषिष
कर रहा हूं। पिछले बीस वर्षों से यह प्रयास जारी है। इस वक्त आधी रात बीत चुकी है। आसमान पर
शरद पूर्णिमा का चा ंद दमक रहा है। टेबिल पर जो शराब की आधी बोतल है वह चांदनी की रोषनी में
नहा कर आज ज्यादा नषीली हो जायेगी। तब मैं शायद अपनी जिन्दगी की आधी रात में अपने मन के
भीतरे कैद काल कोठरीे के दरवाजे पर दस्तक दूंगा, दरवाजा खुल जायेगा, रहस्य से परदे उठ जायेंगे,
अतीत के रंग इस कमरे की हवा में नाचने लगेंगे। मैं नंगा हो जाऊ ंगा, अपनी नजरों में, और आप सभी
की नजरों में। पर नंगे हुए बिना सच का सामना कैसे किया जा सकता है। सच की पहली शर्त है कि
तुम मेरे सामने नंगे हो जाओ तब तुम या मैं साफ-साफ एक-दूसरे को उसी तरह देख पायंेगे जैसे तुम
दर्पण को देखते हो और दर्पण तुम्हे देखत है। काल-कोठरी का सच नीम – करेले की रस से भी
तीखा, अग्नि की ताप से कहीं ज्यादा ज्वलनषील जो शरीर ही नहीं मन और आत्मछवि को जलाकर राख
कर देती है। पर इसके बावजूद मुझे आज काल कोठरी में जाना ही होगा। कल तक बात कुछ और थी,
आज बात कुछ और है। कल तक मा ं जिन्दा थी आज मेरी मां इस दुनिया में नही ं है। उनके भीतर की
काल कोठरी मेरे सामने है। इस टेबिल पर जो काले रंग का बक्सा रखा हुआ है, जिस पर इस वक्त
चांदनी अपनी शीतलता की वर्षा कर रही है। यह मा ं की काल कोठरी से निकल कर मेरे पास आया है।
दरअसल मेरी मां की मृत्यु के बाद उनके वकील दयाचन्द जी यह काले रंग का बक्सा मुझे दे गये।
बक्सा देते समय दयाचन्द जी बड़े दार्षनिक भाव में बोले… आपकी मा ं की अंतिम इच्छा थी कि यह बक्सा
उनकी मृत्यु के बाद आप तक पहुंचा दिया जाय… शायद इसमें आपके लिए जीवन का कोई सूत्र छुपा हो ..
.. ध्यान से देखिएगा। और मैंने ध्यान से ही देखा, मेरे जीवन के कुछ पुराने सूत्र निकल आये, या यूं
कहें तो मेरी जिन्दगी का वो हिस्सा जो अबतक मेरे मन की काल कोठरी में कैद था, उसका खास अंष
मेरी मां की काल कोठरी से बाहर आया। इस बक्से से मेरा एक रेडियो बाहर आया है। जो अब भी चालू
होने की स्थिति में है, वह वायलियन जिसके तार अब भी जुडे़ हुए हैं, और मा ं की यह नीली डायरी।
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इसके साथ मेरे माता-पिता का तलाकनामा….. जो मेरे लिए इसलिए मायने रखता है कि मां ने हमेषा
मुझे यही बताया कि मेरे जन्म से पहले मेरे पिता का देहान्त हो चुका था। तो फिर यह तलाकनामा वो
भी जिस पर मेरे जन्म के दो साल बाद की तारीख है। यह क्या है? कहावत कितनी गलत साबित हो
जाती है कि औरत के पेट में बात नहीं पचती, पर मेरी मा ं ने तो पूरी सच्चाई को पचा लिया। क्यों, ऐसा
क्यों किया मेरी मां ने? एक बच्चे को बाप से, और एक बाप को अपने बच्चे से अलग क्यों कर दिया?
आज मैं जीवन के जिस मोड़ पर खड़ा हूं उसके लिए मेरे जीवन की कुछ घटनाएं जिम्मेदार है। अगर मेरे
जीवन में वो घटनाएं नहीं होती तो मैं एक दूसरी तरह का इन्सान होता… शायद मेरे मन के भीतर कोई
काल कोठरी नहीं बनती और बनती भी तो मैं अपने मन की काल कोठरी से दूर भागने की कोषिष नहीं
करता। मैं अपने जीवन में वही हो पाता या वो होने की कोषिष करता रहता जो होने के लिए मेरा
जन्म हुआ था। सचमुच मेरा यह विष्वास है कि मानव जीवन की सफलता इसी में है कि जो मानव होना
चाहता है वो होकर मरे, जैसे एक गुलाब का बीज गुलाब का फूल बन कर मरता है, वो चमेली या
सूर्यमुखी फूल होने की कोषिष नहीं करता… पर अब तो कोषिष भी बन्द हो गई है। जी हा ं! मैं डाक्टर
हूं पर मेडिकल प्रोफेषन में मैंने कोई चमत्कार नहीं किया। हा ं शहर के बीच एक नर्सिंग होम का मालिक
हूं…… अपने से ज्यादा व अनुभवी और क्वालिफाइड डाक्टरा ंे से काम करवाता हूं। अगर कोई डाक्टर मेरे मन
के विपरीत बात करता है तो उससे कहता हूं यू. डाक्टर अस्थाना, तुम जैसे पचास डाक्टरों को मैं खरीद
सकता हूं…. यू. जस्ट फायर… यह काम मैंने नहीं किया है मां मेरे भीतर प्रवेष कर यह काम करती है।
मेरा डाक्टर होना मेरा नर्सिंग होम का मालिक होना, यह सब कुछ मेरी मा ं ने मेरे दिलो दिमाग पर हावी
होकर मुझसे करवाया है। वह लेडी हिटलर थी। सारा स्कूल उन्हें लेडी हिटलर प्रिसिपल मेम को नाम से
जानता था। मैं भी उसी स्कूल में पढ़ता था… और मेरा दोस्त रियाज भी, वह मेरे सामने खुल कर कहता
था, यार! तेरी मां सचमुच लेडी हिटलर है, क्या वह घर पर भी तेरे साथ ऐसा ही व्यवहार करती है? हां
यार! क्या घर क्या बाहर, मेरी मा ं का चेहरा एक जैसा ही रहता है। अपने नाक पर मक्खी नही ं बैठने
देती है, उनके शब्द, उनके विचार इस्पात की तरह मजबूत और पर्वत की तरह अडिग होतें है। सचमुच मैंने
अपनी मां को जीवन के किसी मोड़ पर कमजोर होते हुए नही देखा है। वह हमेषा अपने और दूसरे के
जीवन पर हावी रही। मेरे जीवन पर तो उनका एक तरह से कापीराइट था। परंतु मैं उनकी कापरराइट की
सीमा तोड़ अपनी सुरमय दुनिया मंे जी रहा था, चुपके-चुपके। मैं और मेरा यह रेडियो, ध्वनि तरंग की
दुनिया की यात्रा पर निकल जाते थे। रात के वक्त चादर या रजाई के भीतर मैं रेडियो के साथ सो
जाता जैसे एक बच्चा अपनी मा ं के सीने से चिपक कर सो जाता है जैसे मां लोरी सुना रही हो और मैं
लोरी सुनता उसका बच्चा। रात नौ बजे तक हमदोनो का साथ रहता था। फिर हमदोनो संगीत की दुनिया
को याद करते-करते सो जाया करते थे। मैं आपको बता नहीं सकता संगीत मेरे लिए क्या था। बस
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इतना समझ लीजिए कि संगीत मेरे लिए जादु है, चमत्कार है, जिसका हमारी तरह कोई शरीर नही ं होता।
उसे कोई देख नहीं सकता, परंतु संगीत हजारों, करोड़ो लोगो की आत्मा को स्पर्ष करने की शक्ति रखता
है। उसकी आत्मा को सरगम की लहरों पर सवार कर सुरो की दुनिया मे ले जाता है। इतनी व्यापक
शक्ति है संगीत में…. परंतु संगीत की सारी शक्तिया ं मेरी मा ं के सामने प्रभावहीन साबित हो जाती है।
मेरी मां को संगीत से एलर्जी थी.. जैसे कई लोगो को धूल, धुआ ं, गन्ध से एलर्जी होती है। उसके सामने
संगीत तो दूर संगीत की बातें करना भी घोर अपराध था, और मैं यह घोर अपराध उनकी नाक नीचे
प्रतिदिन कर रहा था ं मुझे परिणाम मालूम था। फिर भी मैं अपनी दीवानगी के हाथों मजबूर था और एक
रात मेरी चोरी पकड़ी गई। जब मैं रजाई में छुपा रेडियो सुन रहा था। उस सर्द रात मेरे दोनों गाल गर्म हो
गये। मां ने चार-पांच चाटे दोनों गाल पर बारी-बारी से मारे और गुस्से से कांपने लगी और कापती
आवाज में बोली- अमन जो लोग शापित होते हैं वही लोग कलाकार बनते हैं, उनकी सारी जिन्दगी दुःख,
दर्द, संघर्ष की दास्ता होती है, जो न जाने क्या खोजते हुए बेचैनी में जीवन भर भटकते रहते हैं। तुम्हे
डाक्टर बनना है, संगीतकार नहीं। इतना बोलते मा ं का चेहरा गुस्से से विकृत हो गया। मुंह से फेन
निकलकर होंठो तक आ गया। झटके से रेडियो मेरे हाथ से छीनकर कमरे के बाहर निकल गई। अवाक सा
बिस्तर बैठा शून्य में मैं देखता रह गया। उस सर्दी की उस पूरी रात मैं सो नहीं पाया, बिस्तर पर किसी
लाष की तरह पड़ा रहा। मन में कई सवाल बिच्छू की तरह डंक मार रहे थे। यह मां को क्या हो गया?
मां का इतना भयानक और विकृत रूप! संगीत से इतनी घृणा क्यों? मैं अब कैसे संगीत के बिना रह
पाऊ ंगा? उस वक्त मेरी उम्र कोई आठ साल के बीच रही होगी। इसलिए बस इतना ही समझ पाया कि मुझे
अपना प्यारा रेडियो पाना है चाहे इसके लिए मुझे चोरी ही क्यों न करनी पड़े। यह सोच कर मैं दूसरे दिन
से ही घर में रेडियो खोजने का काम युद्ध-स्तर पर शुरू कर दिया। सारा घर छान मारा पर रेडियो का
नामो निषान तक नही मिला तब मेरा मन बहुत बेचैन हो गया, बेचैनी से मैं कालकोठरी यानि स्टोर रूम
के तरफ गया जो हमेषा बन्द रहता था। मा ं कभी-कभी अकेले उस स्टोर रूम में जाती और भीतर से
दरवाजा बन्द कर कुछ देर बिना आवाज़ किये न जाने क्या करती रहती, फिर जब उस काल- कोठरी का
दरवाजा खोल बाहर निकलती तो उनकी आंखे लाल सूजी हुई रहती। मैं मां से पूछता मां स्टोर रूम से
जब तुम बाहर निकलती हो, तुम्हारी आंखे लाल क्यों हो जाती है ? इस पर मा ं इतना ही कहती स्टोररूम
की सफाई कर रही थी धूल के कारण आंखे लाल हो जाती है। मैं मां की बात मान लेता कि मा ं कभी
झूठ बोल ही नहीं सकती। परंतु दिल में एक सवाल तीर की तरह चुभता रहता कि मा ं की आ ंखे उस
समय लाल क्यों नहीं होती जब मां घर की सफाई करती है? पर यह प्रष्न करने की हिम्मत मुझमें नहीं
थी। आखिर क्या रहस्य कैद है इस काल-कोठरी में जिससे मेरी मां की आंखें लाल हो जाती है? मैं इस
काल कोठरी के भीतर जरूर जाउंगा, परंतु काल कोठरी के भीतर जाने के लिए मुझे चाभी की चोरी करनी
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होगी, काल कोठरीे के दरवाजे के ताले की चाभी मिलते ही मेरा काम हो जायेगा। पर ंतु चाभी तो मां के
की-रिंग में होगी। की-रिंग मां हमेषा अपने पास रखती है। रात सोती है तो तकिया के नीचे की-रिंग
दबा देती है। आखिर की-रिंग कैसे हासिल किया जाये? इसी सोच में एक सप्ताह निकल गया। हर दिन
की जासूसी कर रहा था … आखिर वो दिन आ गया रविवार जब मां की-रिंग भूल से टेबिल पर रख
बिस्तर पर सोने चली गई। सप्ताह भर में यह पहला अवसर था जब मा ं अपने की-रिंग को सही जगह पर
रखना भूल गई थी। बस मैं चुपके से बिल्ली की तरह दबे पांव टेबिल के पास गया और बिना कोई आवाज
किये की-रिंग उठा लिया। उस वक्त मेरे हाथ पैर कांपने लगे थे, गला सूखने लगा था ….. चेहरा और
शरीर पसीने से भी ंग चुका था, अगर उस समय मा ं जाग जाती तो षासद मैं डर कर बेहोष हो जाता।
परंतु मां सेाती रही और मैं डरते-डरते अपना काम कर गया। वो कहते है कि इच्छाशक्ति प्रबल हो तो
लाख डरने के बावजूद मनुष्य अपना लक्ष्य प्राप्त कर ही लेता है। मैंने भी अपना लक्ष्य प्राप्त कर लिया
था …. आंगन में बनी काल-कोठरी के पास धीरे से पहुंच गया और बिना कोई आवाज किये किसी कुषल
चोर की भांति मैंने काल कोठरी का दरवाजा खोल दिया…. दरवाजा खुलते ही मेरी आखों के सामने
टूटे-फूटे, पुराने समानों का ढेर दिखाई दिया। पुरानी लकड़ी की कुर्सी, जिसकी टांगे टूटी हुई थी, पुराने
प ंखे जिसके प ंख टूट कर अपने षरीर से लटक रहे थे। पुराने कपड़े उलटे-पुलटे तरीके से कालकोठरी के
हैंगर पर लटके हुए थे…. एक बड़ा सा टेबिल लैम्प जिसके तार को चूहों ने बीच-बीच में कुत्तर दिया था।
लैम्प का बल्ब अन्धा हो चुका था इसलिए भीतर से काला हो गया था … एक कलमदान जो एक कोने
में तीन टा ंग के टेबल पर रखा हुआ था। मैं उस कलमदान के पास गया तो उस पर लिखा हुआ था…
प्रिये अनिता को सप्रेम भेंट! अनिता मेरी मा ं का नाम था षायद मेरे पिता ने मा ं को यह कलमदान भेंट
किया होगा। मैं कलमदान को हाथ से उठाकर देखने लगा, सचमुच कलमदान अपने समय में बहुत ही
खुबसूरत रहा होगा। अब वक्त की मार कलमदान पर साफ दिखाई दे रही थी। तभी कालकोठरी में
खड़-खड़ कीे आवाज हुई और ध्यान पीछे की तरफ गया, कमरे के दूसरे कोने मंे …. पहले तो मैं डर
गया की कहीं मा ं तो नही ं आ गई फिर जब देखा तो सामने से एक मोटा चूहा तेजी से निकल कर काल
कोठरी से बाहर निकल गया। यह देख मुझे भी अपना लक्ष्य याद आ गया कि मुझे भी जल्द से जल्द
अपना काम पूरा कर काल-कोठरी से बाहर निकल जाना है। इसके साथ ही तेजी से मेरे षरीर में हरकत
हुई, मैं रेडियो खोजने लगा, खोजते-खोजते मेरा ध्यान एक काले बक्से पर गया, जिस पर कोई ताला नहीं
लगा हुआ था। मैने जब वो बक्सा खोला तो मेरी आंखें स्थिर हो गई। बक्से में मेरे बचपन की चीजें भरी
हुई थी, मेरे खिलौने, घोड़ा, हाथी, सिपाही, फुटबाल, कलर बाक्स, नर्सरी, क्लास की कापियां, बैग, गुडि़या,
चाभी से चलने वाली नाव, इसके साथ मेरा रेडियो और एक वायलिन भी रखा हुआ था …. यह सब चीजें
देखने के बाद मुझे ऐसा लगा जैसे मेरे बचपन के यह सभी साथी आष्चर्य से मेरी तरफ देख रहे हों और
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मुझ से पूछ रहे हों कि तुम्हे अपने बचपन की याद आई हम कब से तुम्हारा इंतेजार कर रहे थे…. चलो
तुम आये तो सही …. सच कहता हूं मेरी आंखों से आंसू टपक कर खिलौने पर गिरने लगे मन में यह
विचार तेजी से उभरा, सचमुच मेरे बचपन के खिलौने भी मेरी तरह खेलना चाहते होंगे परंतु मा ं इसे बक्से
में बन्द कर इस काल-कोठरी में डाल दी है। क्योंकि अब मेरे खिलौने बदल गये हैं। अब मैं रेडियो से
खेलता हूं और अब यह वायलिन जो मुझे मिल गया है मैं इसके साथ भी खेलूंगा ….. । अपने बचपन के
खिलौने को बारी-बारी से स्पर्ष कर मैंने रेडियो और वायलिन बाहर निकाल लिया और बिना किसी
शोर-शराबे के काल-कोठरी से बाहर निकल गया। चाभी वापस टेबल पर रख दिया। सबकुछ ठीक-ठाक हो
गया था। परंतु रेडियो और वायलिन को कहांे छुपाऊ ं ? यह एक समस्या थी जिसका समाधान मैंने निकाल
लिया। रेडियो और वायलिन को रियाज़ की दुकान पर छुपा दिया। रियाज और मैं सिर्फ इस बात को जानते
थे कि वायलिन और रेडियो कहां पर छुपा कर रख गया है। इसे छुपाने में एक रहस्य छुपा हुआ था और
इस रहस्य से हमदोनों को अजीब सी खुषी मिलती थी। जैसे खजाने छुपाने वाले लोगों को होती होगी। वो
मेरी जिन्दगी के सुनहरे दिन और सपनों से भरी रातें थी। चोरी चुपके रेडियो सुनना और वायलिन बजाने
की कोषिष करना, रियाज करीब-करीब सभी वाद्ययंत्र बजा लिया करता था। क्योंकि उसके अब्बा बैंड
मास्टर थे और बैंड-बाजा की दुकान चलाते थे। वह मुझे वालियन बजाना सिखाता था। उस वक्त रियाज
के दुकान पर हमदोनो ही हुआ करते थे। उसके अब्बा हुजूर घर आराम करने चला जाया करते थे। हम
रोज़ स्कूल से छुटते ही तेजी से दुकान की तरफ भागते थे। मां स्कूल से करीब एक घंटे बाद लौटेगी इस
बात का हम दोनों खूब लाभ उठा रहे थे। घर की एक चाभी मेरे पास थी तो मां के घर पहंुचने से
पहले, मैं घर पहुंच जाया करता था। उस पूरे एक घंटे में हम संगीत को जी लेते थे और इस उम्मीद से
हम अपनी संगीत यात्रा को विराम देते थे कि कल फिर कुछ नये गीत के साथ हमारीे संगीत यात्रा
आरंभ होगी। रात संगीत को याद करते-करते और यह सपना देखते-देखते सो जाता था कि एक दिन
मैं बहुत बड़ा गायक बनुंगा। स्टेज पर गाऊ ंगा, फिल्मों में गाऊंगा …. दुनिया ं में मेरा संगीत सुना जायेगा,
मेरे पास मेरे फैन्स के पत्र और कार्ड आयेंगे। फिर शायद मां भी संगीत को पसंद करने लगेगी। इस तरह
दिन बीतने लगे, करीब छः माह बीत गये, हमारी वार्षिक परीक्षा हो गई। परिणाम भी सामने आ गया, मैं
हर साल की तरह अपने क्लास में प्रथम आया, मां इस बात से बहुत खुष हुई। मुझे एक नई साइकिल
गिफ्ट में मिल गई। अब मेरे और रियाज के लिए और भी सुविधा हो कि हम दोनों कम समय में स्कूल से
दुकान पर पहुंच जाते थे। तभी एक दिन रविवार को मां सुबह-सुबह मुझे बोली- बेटा अमन मैं स्कूल के
काम से रा ंची जा रही हूं, शाम तक वापस लौट आऊंगी। तुम घर पर रहना और पढ़ाई करना, कही ं बाहर
मैदान में खेलने नहीं जाना …। यह सुन मैंने भोलेपन से सिर हिलाकर मां की बातों से सहमति जता दी।
परंतु मेरे मन में मोतीचूर के लड्डू फूटने लगे थे। मन से आवाज आई, चलो आज रविवार है, अच्छा मौका
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है दिन भर की संगीत यात्रा हो गई। बस मा ं के जाते ही मैं साइकिल लेकर रियाज की दुकान पर पहुंच
गया। परंतु दुकान में सफेदी हो रही थी। यह देख मेरा मन बैठ गया, परंतु तभी मेरे दिमाग में आइडिया
आया, क्यों न स्वर्णरेखा नदी के चट्टान पर बैठकर रेडियो सुनना और वालियन बजाना, बहुत मजा
आयेगा। अबतक तो हम बंद कमरे में संगीत सुनते आएं हैं, आज पहली बार स्वर्णरेखा नदी के किनारे
बैठकर संगीत सुनना सचमुच अद्भुत अनुभव होगा चूंकि स्वर्णरेखा नदी हम साल में चार-पांच बार जाया
करते थे। छठ पूजा, दुर्गा पूजा, होली, सरस्वती पूजा, और गणेष पूजा में मूर्ति भसाने। मैंने रियाज को
तैयार किया …. रियाज नदी जाने के लिए तैयार नहीं था, उसे पानी से बहुत डर लगता था, परंतु मेरे
लिए रियाज नदी जाने के लिए तैयार हो गया। शीत ऋतु की वो सुबह मैं जीवन भर नही ं भूल सकता,
वो दिन मेरे जीवन के अद्भुत दिन थे, स्वर्णरेखा नदी का किनारा, हवा में हल्की नमी, नदी में बहती
कल-कल की धारा, पानी का रंग नीला दिखाई दे रहा था। चट्टान पर बैठे हमदोनों विविध भारती सुन
रहे थे। सर्दी की मीठी धूप हमारे षरीर को गुदगुदा रही थी तो संगीत हमें अपने स्वर लहरी पर सवार
कर सरगम की दुनिया में ले जा रहा था। रेडियो पर एक के बाद एक गाने आते रहे, हम गीत सरिता में
डुबकी लगाते रहे। समय और स्थान का विचार हमदोनों के मन से मिट चुका था। हम दोनों की आत्मा
संगीत में डूब चुकी थी। कब सूरज पूरब से पष्चिम की तरफ पहुंच गया, इसका कोई अनुभव हमदोनों को
नही ं हुआ। तभी मां की आवाज ने हमदोनों को चैका दिया….. अमन …… अमन…! तीर की तरह यह
ध्वनि मेरे और रियाज के कानों को भेद कर हमें भयभीत कर दी। सिर घुमा कर हमदोनों ने पीछे की
ओर देखा तो मां हाथ में छड़ी लिए तेजी से हमारी तरफ आ रही थी। मां के बाल खुलकर हवा में लहरा
रहे थे, उनकी चाल और चेहरे से लग रहा था कि मां पर उसी दिन की तरह गुस्से का दौरा पड़ा है। यह
देख रियाज पहले उठकर भागा, वह तेजी से काले चट्टान पर दौड़ने लगा, मैं अपनी जगह खड़ा कभी
रियाज को देखता तो कभी मां को अपने पास आते देखता। मेरी समझ में कुछ नही ं आ रहा था कि मैं
किधर जाऊ ं … तभी मा ं जोर से चीखी रियाज… रूक जाओ.. और रियाज के भागते पैर रूक गये…. वह
हांफते हुए मां की तरफ पलटा, मां रियाज के तरफ देखते हुए बहुत गुस्से से बोली चलो जल्दी मेरे पास
आओ …. बेचारा रियाज जो मां से पहले ही बहुत ही डरता था, तेजी से मां की तरफ भागा, और तभी
अचानक उसका पैर चट्टान से फिसल गया, दूसरे ही पल रियाज हवा में लहराया, गहरी नदी की गोद में
धड़ाम से गिरा. मेरे मुख से चीख निकल गई- रियाज… । परंतु रियाज़ कुछ बोल नहीं पाया…. पानी में
एक दो बार हाथ पैर मारा, मेरी तरफ हाथ बढ़ा कर अपने को बचाने का इषारा किया। मैं नदी में कूदने
ही वाला था कि मां ने मुझे पीछे से आकर बांहों में जकड़ लिया…… मैं रियाज…. रियाज चीख रहा था,
मां कि बांहों से खुद को आजाद करने कि कोषिष कर रहा था, उधर मेरा रियाज़ पानी में डूब रहा था।
सचमुच उस दिन मेरा रियाज़ पानी में डूब गया। दो दिन बाद उसकी लाष बाहर आई तो उसकी आंखे
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खुली हुई थी….. जैसे मुझसे षिकायत कर रही हो, यार अच्छी दोस्ती निभाई, तुम अपने रियाज़ को बचा
नही ं पाए। रियाज़ की मौत ने मेरी जिन्दगी बदल दी…. संगीत मेरे लिए दर्द बन गया संगीत से मन
उदासीन हो गया। मैं एक सर्द खामोषी में कैद हो गया। अपने आप में जीने वाला इन्सान जिसे इस
दुनिया की कोई जरूररत नहीं हो। मां का व्यवहार मेरे लिए बदल चुका था ….. वह बात करना चाहती,
नये बहाने लेकर मुझसे बात करने की कोषिष करती… पर मेरी खामोषी का सामना कर वह वापस चली
जाती। समाज के लोग और रियाज़ के अब्बा और मेरी मां ने रियाज की मौत को सिर्फ एक घटना मान
कर भूलाने की कोषिष करने लगे। पर ंतु रियाज़ की मौत मेरे लिए मौत नही ं, हत्या थी… पर हत्यारा
कौन था ? मैं या मेरी मां ? कभी सोचता हूं कि, काष! रियाज को नदी नहीं ले जाता, कभी सोचता
हूं काष रियाज़ का पैर चट्टान से फिसलता ही नहीं, काष! मां की आवाज सुनकर रियाज़ भागा न होता
…. काष! मां नदी तक नहीं आई होती तो हमदोनों उस शाम खुषी-खुषी घर लौट गये होते …. काष!
रियाज़ आज मेरे साथ होता तो यह ख़ामोषी और अकेलापन मुझे नहीं जकड़ता ….। जितना इस ‘काष’ के
बारे में सोचता हूं उतना ही मन में पीड़ा होती है, और इस पीड़ा के बारे में किसी से कुछ कह भी नहीं
सकता। क्योंकि मुझे लगता है कि मेरी भावना को कोई समझ नहीं सकता। मेरी मां भी नही ं समझ
सकती। मां ने रेडियो और वायलिन को फिर से काल-कोठरी में बन्द कर दिया। मा ं को संगीत के प्रति
जो एलर्जी थी वह आज भी वैसा है। रियाज की मौत से कहीं कुछ भी नही ं बदला है। मा ं अब भी वैसी
है जैसे वह पहले थी। इस घटना ने हम मां बेटे के बीच एक गहरी खाई खोद दी, जिस पर कोई पुल का
निर्माण जीवन भर नही ं हो सका। आज मां की मृत्यु के बाद, यह वही वो काला बक्सा मेरे पास वापस
आया है, तीस साल बाद, जिसमें मेरी जिन्दगी का वो हिस्सा कैद रहा। इसके साथ मां का यह पत्र जो
उन्होंने अपनी मौत के दस दिन पहले लिखी थीबेटा
अमन,
तीस वर्ष हो गये हमे साथ रहते हुए परंतु इन तीस वर्षों में तीन मिनट भी हम कभी एक साथ
बैठ कर बातें नहीं की। नदी के दो किनारे की तरह हमदोनों इस कोठी में जीते रहे, हमारे बीच जिन्दगी
बहती रही, परंतु जिन्दगी भर हमदोनों ही प्यासे रहे। तुमने अपने आपको शराब में डुबो लिया और मैं
अपनी ख़ामोषी में कैद हो गई। अब अपनी मौत को स्पष्ट देख पा रही हूं। इसलिए इस खामोषी को
तोड़ने का प्रयास कर रही हूं। पता नही ं मेरी मौत के बाद यह ख़ामोषी टूटेगी या और गहरी हो जायेगी
कुछ कह नहीं सकती। बहुत से प्रष्न हमारे बीच शूल बनकर हमदोनो को चुभते रहे हैं। तुम्हे याद होगा
तुमने कई बार मुझसे पूछा था कि स्टोर रूम की सफाई के बाद मेरी आ ंखे लाल क्यों हो जाती थी।
दरअसल मेरी आ ंखे रोने से लाल हो जाती थी। यह आ ंसू एक पत्नी के होते थे, जिसे उसका पति छोड़कर
चला गया था। तुम्हारे पिता को संगीत का नषा था, और वह इस नषे से निकल ही नहीं पाये, वह जब
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मेरे साथ थे तो साथ होकर भी मुझसे दूर थे। हमदोनों एक दूसरे के करीब आये पर कभी एक दूसरे के
मन को स्पर्ष नही कर पाये, मुझे हमेषा ही अनुभव हुआ कि वह किसी और दुनिया के हैं, और मैं किसी
और दुनिया की, अंततः एक दिन तुम्हारे पिता सदा के लिए अपनी दुनिया में चले गये और आज संगीत
की दुनिया में बहुत बड़ा नाम है नरेन्द्र आलाप… उस समय तुम मेरे गर्भ में आ चुके थे। मुझे डर था
कही ं तुम्हारे पिता तुम्हे मुझसे छीनकर न ले जाये, इसलिए एक झूठ को सच बना दिया, उस झूठ के लिए
मैं अपने आपको अपराधी मानती हूं। मैं आज स्वीकार करती हूं कि मैंने तुम्हे और तुम्हारे पिता को अलग
करने का अपराध किया है। इसकी सज़ा भी मुझे मिल गई है। जब मैं तुम्हारी जि़न्दगी को देखती हूं , जो
बेचैनी, अर्थहीनता अधूरी और बिखरी हुई जि़न्दगी की एक ऐसी तस्वीर है जो अपने आप में एक शूल प्रष्न
है। काष! तुम वो हो पाते जो तुम होना चाहते थे। काष! मैं लेडी हिटलर नहीं होती। एक मां होती,
सिर्फ मा ं, तो आज तुम्हारा रियाज़ जिन्दा होता। पर बेटा मैने जो कुछ भी किया तुम्हे पाने के लिए किया,
जिस प़ल तुम्हारे पिता मुझे छोड़कर चले गये उसी पल से मेरे भीतर एक ऐसी नारी का जन्म हुआ जो
अपने जीवन पर अपना नियंत्रण चाहती थी, किसी को कभी इतना अधिकार न दे कि कोई उसे छोड़कर
चला जाये। मैंने वही किया एक ऐसी नारी का अभिनय जिसे स्कूल के बच्चो ने लेडी हिटलर का नाम
दिया। परंतु बेटा इस लेडी हिटलर के पीछे मेरी ममता, मेरा प्यार कितना घायल हुआ और दमित हुआ है
यह सिर्फ मैं ही जानती हूं। रात-रात भर तुम्हारे बिस्तर के पास बैठी तुम्हारे पीठ पर उभर आये बेत की
दाग को देखती रहती, रोती रहती, उस पल मेरी ममता मुझे धिक्कारती, मेरा प्यार मुझे कोसता, तुम्हारे
पिता मेरे मन में आकर बोलते अनिता इस मासूम से तुम प्रतिषोध मत लो … जो गलती हमदोनो से हुई
है, इसका कोई दोष नहीं है। यह मासूम निर्दोष, अबोध, अनजान है, यह सुनकर मेरा हदय दर्द से आज
भी फटने लगता है। परंतु बेटा मैं क्या करती एक बार तेरे पिता से हार कर दोबारा तुमसे हारना नहीं
चाहती थी। इसलिए संगीत से तुम्हे दूर रखना चाहती थी। परंतु यह मेरे जीवन का दूसरा अपराध था।
तुम मेरे कहने पर डाक्टर बन गये…. परंतु मैंने अपना बेटा खो दिया, एक बार फिर मैं जीत कर हार
गई। इस हार की चोट ने समय के साथ-साथ मुझे खोखला कर दिया तीस वर्षों तक इस चोट को
प्रतिपल सहती रही, अपनी हार को जीती रही…. तुम्हारी जि़न्दगी को देखती रही जो भीगी हुई वृक्ष बन
गई है, जिसकी जड़ में आग लगा दी गई है, वो न जल पा रही थी और न बुझ पा रही थी। तुम बेटा
जिन्दगी जी नहीं रहे हो, जि़न्दगी में मौत खोज रहे हो, और दिन-प्रतिदिन मौत के करीब होते जा रहे
है। मैंने तुम्हारे लिए ऐसी जिन्दगी नही ं चाही थी… बस अब रूक जाओ.. मुझे यह समझ कर माफ कर
देना कि मैंने जो कुछ भी किया उसके पीछे एक कमजोर भयभीत और अकेली मा ं थी। जो तुम्हे बेहद
प्यार करती रही और करती रहेगी। तुम्हारे पास तुम्हारे हिस्से की जि़न्दगी भेज रही हूं हो सके तो इस
जि़न्दगी को अपना कर अपनी वही जिन्दगी शुरू करना जो तुम चाहते थे। इस काले बक्से में तीन
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जि़न्दगिया है, मैं तुम और तुम्हारे पिता यह वायलिन उनकी आखिरी निषानी है। जो तुम्हारे जीवन को सुर
दे पाये। खुष रहना बेटे, और मुझे माफ़ कर देना… तुम्हारी मां….
पत्र पढ़कर मैं भीतर से खाली हो गया जैसे शराब की पूरी बोतल खाली हो चुकी थी. जो कुछ
पहले से समझा-बुझा था वो सबकुछ चरमरा कर मेरे भीतर गिर चुका था। उसका अस्तित्व मेरी आंखों के
सामने विलीन हो रहा था। दरअसल आज इस ढलती हुई चा ंदनी रात में मुझे यह समझ में आया कि हम
जो जीवन के बारे में समझते हैं उसका दूसरा पक्ष हमारी नजरों से अदृष्य रहता है। काष! मैं अपनी मां
के भीतर अकेली, भयभीत, कमजोर मा ं को समझ पाता तो मैं अपनी मा ं को पा लेता.. जिसे मैंने अब
सदा के लिए खो दिया है। पर ंतु मां जाते-जाते जीवन के सूत्र पकड़ा गई। यह रेडियो और वायलिन मैं
कोषिष करू ंगा, जीवन से वही आलाप कर पाऊं जो मेरे मन की काल-कोठरी में सोया हुआ है, इतना
बोल अमन वायलिन उठाकर बजाने की कोषिष करने लगता है। कोठी के बाहर चिडि़यों की चहचहाहट शुरू
हो जाती है। वायलिन और चिडि़यों की चहचहाहट के बीच अमन खिड़की से बाहर देखता है, पूर्व द्वार से
एक नया सबेरा धरती पर उतरने की तैयारी कर रहा है।
रविकांत मिश्रा रविकांत मिश्रा
रोड न ं. 24, बी. एन. 300/2/5
आदित्यपुर,-2

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