


सोनम कुमार
बासुकीनाथ में महाशिवरात्रि को लेकर हुई कार्यक्रम की शुरूआत
दुमका।
फौजदारी बाबा बासुकीनाथ में महाशिवरात्रि के पावन पर्व की शुरूआत बुधवार से विधिवत शुरू हो गयी। भोलेनाथ के मुख्य मंदिर के गुंबज पर स्थापित पंचशूल, कलश एवं त्रिशुल के अलावा माता पार्वती, माता काली, माता अन्नपूर्णा, श्रीकृष्ण मंदिर, आनंद भैरव समेत अन्य सभी मंदिरों के गुंबजों पर स्थापित कलश एवं त्रिशूल को उतारा गया। इसकी साफ-सफाई करने के उपरांत वापस शुक्रवार को महाशिवरात्रि के अवसर पर इन्हें पूर्व निर्धारित गुंबजों पर स्थापित किया जायेगा। उतारे गए पूजन सामग्री को स्पर्श करने एवं आशीर्वाद लेने के लिए भक्तों की भारी भीड़ उमड़ी। इस मौके पर मंदिर प्रभारी सह बीडीओ संजय कुमार दास, सरकारी पुरोहित प्रेमशंकर झा, सरकारी पूजारी सदाशिव पंडा, डब्लू चौधरी, दिनेश बाबा, गणेश झा, बोंगा बाबा, मनोज पंडा, पंडित मनोज झा, धर्मेन्द्र झा, जितेन्द्र झा, मंदिर प्रबंधक चंद्रशेखर झा, सुभाष कुमार, मदन झा, उपेन्द्र झा, विधिकर शौखी कुंवर, फुलेश्वर कुंवर, नरेश राव टेस्का, केशव राव सहित दर्जनों अन्य मौजूद थे।
–बासुकीनाथ में स्थापित भगवान शंकर के पंचशूल का रहस्य
फौजदारी बाबा के नाम से प्रसिद्ध बाबा बासुकीनाथ के गुंबज पर स्थापित पंचशूल एवं त्रिशूल के बावत मान्यता है कि इसके दर्शन मात्र से सभी मनोकामनाएं पूरी हो जाती हैं। प्राचीण गंर्थो के मुताबिक भगवान शंकर के अंगायुधों में तीन और पांच की संख्या में मणिकांचन संयोग समाविष्ट है। भगवान शिव त्रिनेत्रधारी है तो पंचानन भी है। बासुकीनाथ के पंडित कन्हैयालाल पाण्डेय बताते है कि बाबा बासुकीनाथ के गुंबज पर वर्षों से विराजमान पंचशूल के दर्शन मात्र एवं नमन करके यात्रा प्रारम्भ करने से कार्य में सफलता मिलती है।
शास्त्रों का उदाहरण देते हुए बताते है कि संसार की रचना पंच महाभूतों से हुई है। चौरासी लाख योनियों की सृष्टि पंच तत्व से मानी गई है। क्षीति, जल, पावक, गगन, और समीर से प्राणियों का सृजन और इसकी विकृति से सृष्टि का संहार भी होता है। त्रिताप और द्विरूग्नता अर्थात दैहिक, दैविक और भैतिक ये तीन ताप और आदि एवं व्याधि और मानसिक एवं शारीरिक दो रोग मिलकर पंचशुल पैदा होते है। यह पंचशूल भगवान शिव की तरह दूसरा आयुध भी है। जो यह पांचभैतिक कष्टों का प्रतीक चिन्ह भी है। मानव से प्रतिदिन जाने या अनजाने में घर में झाडू लगाने, घर की सफाई करने, जल के घड़े रखने के स्थान में दबने से, खाना बनाने के क्रम में अग्नि जलाने में, पूजा के क्रम में दीपक जलाने में जलने से, चक्की या मशीन चलाने में पीसने से सहित कई अन्य प्रकार के दैनिक कार्यों के निष्पादन के दरम्यान कई प्रकार के जीव-जन्तुओं का नाश अथवा अनिष्ट होता है यानि इससे पांच प्रकार के अपराध होते है। ये कृत्य पंचशूल के कारण है। इसी पंचशूल को भगवान शंकर का एक आयुध भी माना गया है जो पापियों के लिये त्रासदायक और पुजा करने से कष्ट निवारक भी होता है। पांडेय बताते है कि भगवान शंकर को पंचानन भी कहा जाता है, चूंकि पंचमुखी भगवान शिव के सद्योजात, वामदेव, तत्पुरूष, अघोर और ईशान नामक मुख हैं। भगवान शंकर पंचवाणा ‘कामदेव’ के नाशक भी हैं। भगवान शिव पंचाक्षरी मंत्र ‘नम शिवाय’ के श्रवण से बहुत प्रसन्न होते है, वैसे ही इनके त्रिशुल के अलावे पंचशूल भी अत्यंत फलदायक है। बाबा बासुकीनाथ में भोलेनाथ मंदिर के गुंबज पर स्थापित पंचशूल समेत सभी मंदिरों पर स्थापित कलश, झंडा एवं त्रिशूल को पूरे वर्ष भर में मात्र एक बार महाशिवरात्रि के दो दिन पूर्व उतारा जाता है, इसे साफ-सुथरा करके एवं वैदिक मंत्रोच्चारण के साथ पुनरू महाशिवरात्रि तिथि को अपने-अपने स्थल पर स्थापित किया जाता है।

